जनसंघ के दिनों की अवधारणा है राष्ट्रवाद

Opinion

भाजपा ने राष्ट्रवाद का एक बार फिर संकल्प लेते हुए आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रथम सरोकार माना है। दरअसल राष्ट्रवाद जनसंघ के दिनों की अवधारणा है। उसी दौर में कश्मीर के अनुच्छेद 370 और 35-ए पर डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ‘बलिदान ‘ दिया था। उसके बाद जनसंघ के अध्यक्ष बने दीनदयाल उपाध्याय ने ‘अंत्योदय ‘ का विचार दिया। 1977 में भैरोंसिंह शेखावत और शांता कुमार क्रमश: राजस्थान और हिमाचल के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने ‘अंत्योदय ‘ को लागू करने के सार्थक प्रयास किए। कारगिल युद्ध के बाद 1999 में एक बार फिर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी, तो सरकारी स्तर पर ‘अंत्योदय ‘ को योजना का रूप दिया गया। अब 2019 का जनादेश लेने के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ने फिर राष्ट्र्रवाद, अंत्योदय, सुशासन वाले पुराने संकल्पों को दोहराया है। यह भाजपा की सनातन विचारधारा हो सकती है। ये भाजपा की प्रेरणा, दर्शन और मूल मंत्र भी हो सकते हैं, लेकिन इन भावनात्मक शब्दों से आम आदमी का सरोकार क्या है? कश्मीर में अनुच्छेद 370 और 35-ए को हटाना, समान नागरिक संहिता लागू करना, भगवान राम के मंदिर का निर्माण, नागरिक संशोधन बिल पारित करा कानून बनाना, अवैध घुसपैठियों से जुड़ा कानून आदि संकल्प 2014 और उससे पहले भी किए गए थे और 2019 में भी दोहराए गए हैं। ये आरएसएस के बुनियादी एजेंडे के हिस्से भी रहे हैं। इनके अलावा गंगा मैया की सफाई और निर्मलता, संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण, कई और मुद्दे पहले भी भाजपा के संकल्प रहे हैं और आज भी उन्हें दोहराया गया है। क्या संघ और भाजपा का राष्ट्रवाद यही है? इस देश की हवाएं, मौसम, जंगल, वन-उपवन, नदियां-नहरें, पेड़-पौधे, पशु और पक्षी से लेकर तिरंगे झंडे और सर्वोच्च न्यायालय तक ने भारत को राष्ट्र का रूप दिया है। अलग-अलग राज्य, करीब 1600 क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों, रस्म-ओ-रिवाज, त्योहारों और वेशभूषाओं ने इस देश को बहुरंगी, विविध बनाया है, लेकिन वह समग्रता में ‘भारत राष्ट्र ही है। हमारे प्रथम ‘लौह पुरुष सरदार पटेल ने देश की करीब 540 रियासतों को जोड़ कर भारत का हिस्सा न बनाया होता, तो क्या हम एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र बन सकते थे? इन तमाम भावनाओं को एक ही लड़ी में पिरो दें, इन संवैधानिक और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करें, एकता और अखंडता को एक इकाई के तौर पर ग्रहण करें, तो वही राष्ट्रवाद है, लेकिन यह मान्यता तो 71 साल पुरानी हो चुकी है। यह हमारी सांस्कृतिक विरासत है। तीन साल बाद 2022 में ‘भारत राष्ट्र आजादी के 75 साल पूरे कर रहा है, देश समारोह मनाएगा, उसी के मद्देनजर भाजपा ने अपने चुनाव घोषणा-पत्र में 75 संकल्पों की बात कही है। बेशक भारत माता की जय, वंदे मातरम और जयहिंद के नारे ‘राष्ट्रीय हैं, वंदनीय हैं, लेकिन क्या यही राष्ट्रवाद है? 2019 में भाजपा के 75 संकल्प तो बहुत पुराने हैं। फिर नए भारत में, नए परिप्रेक्ष्य में, ‘राष्ट्रवाद क्या है? भाजपा को कमोबेश अब इसे परिभाषित करना चाहिए। पाकिस्तान के खिलाफ ‘सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट में एयर स्ट्राइक के जरिए भी ‘राष्ट्रवाद की व्याख्या नहीं की जा सकती। बेशक राष्ट्रीय सुरक्षा हमारे सर्वोपरि सरोकारों में शामिल होनी चाहिए। वह प्रत्येक सरकार का बुनियादी दायित्व है, लेकिन रोजगार, काला धन, स्मार्ट सिटी, बुलेट टे्रन, गाय और न्यायिक तथा पुलिस सुधार आदि भी तो सरकार के प्राथमिक दायित्व हैं। भाजपा ने उन्हें कैसे भुला दिया? ये मुद्दे विकास, प्रशासन और आस्था से जुड़े हैं। समग्र विकास भी राष्ट्रवाद का प्रतिरूप है। बेशक प्रत्येक परिवार को पक्का मकान, बिजली-पानी, 100 फीसदी विद्युतीकरण, गांवों को परिवहन योग्य सड़कों से जोडऩा, किसानों-छोटे कारोबारियों को 60 साल की उम्र के बाद पेंशन, हर घर में शौचालय, घर-घर पेयजल, किसानों की आय दोगुनी के साथ-साथ निर्यात को भी दोगुना करना, रेल की पटरियों को ब्रॉडगेज के साथ उनका विद्युतीकरण करना आदि भी संकल्प हैं। यदि ये संकल्प हासिल कर लिए जाते हैं, तो यह भी एक सफल राष्ट्रवाद होगा। भाजपा का जो परंपरागत ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद रहा है, वह शाब्दिक ज्यादा है।
यदि भाजपा के नए संकल्पों पर राष्ट्रवाद की छाया नहीं पड़ती है, तो भाजपा बहुत कुछ हासिल कर सकती है और एक सार्थक राष्ट्रवाद के साथ उसका विस्तार हो सकता है।

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