ई-कचरा उत्पादक देशों में भारत पांचवें स्थान पर

उत्तर प्रदेश देश लखनऊ

लखनऊ। बाबासाहब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ के पर्यावरण विज्ञान विभाग और ई-वेस्ट एक्सचेंज हैदराबाद के सहयोग से बुधवार को इलेक्ट्रॉनिक कचरे के पर्यावरणीय खतरों पर आधारित जागरुकता कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में प्रो. वीपी शर्मा ने बताया कि साल 2018 में 50 मिलियन टन ई-कचरा विश्वस्तर पर था। भारत सालाना लगभग दो मिलियन टन ई-कचरे का उत्पादन करता है। भारत, जापान, जर्मनी, अमेरिका और चीन के बाद ई-कचरा उत्पादक देशों में पांचवें स्थान पर है। बतौर प्रो वीपी, कंप्यूटर उपकरणों में लगभग 70 प्रतिशत ई-कचरा होता है। इसमें मोबाइल फोन और टैबलेट का योगदान 12 प्रतिशत, चिकित्सा उपकरणों का आठ प्रतिशत और इलेक्ट्रिक उपकरणों का वार्षिक ई-कचरा उत्पादन सात प्रतिशत होता है। वक्ता शालिनी शर्मा ने बताया कि इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट में 40 प्रतिशत सीसा और 70 प्रतिशत भारी धातुओं की मात्रा हमारे लैंडफिल में पाई जाती है। ये प्रदूषक तत्व भूजल प्रदूषण, वायु और मृदा प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं। लगभग 95 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक कचरे की रीसाइक्लिंग अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा की जाती है। उन्होंने कहा कि ई-कचरा प्रबंधन नियमों के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माताओं को अपने ई-कचरे के संग्रह की सुविधा प्रदान करनी चाहिए और इसे बाद में अधिकृत रिसाइक्लर्स को वापस करना चाहिए। प्रत्येक वर्ष वैश्विक ई-कचरे का केवल बीस प्रतिशत पुनर्नवीनीकरण किया जाता है। इससे 40 मिलियन टन ई-कचरा या तो लैंडफिल में जलाया जाता है या अवैध रूप से कारोबार किया जाता है। प्रो. एसके द्विवेदी ने कहा कि महाराष्ट्र और तमिलनाडु के बाद उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रॉनिक कचरे के उत्पादन में तीसरे स्थान पर है। इलेक्ट्रॉनिक कचरे के उत्पादन में मुंबई सबसे ऊपर है। इसके बाद नई दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई हैं। सरकारी, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां और निजी क्षेत्र की कंपनियां लगभग 75 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न करती हैं। डॉ वेंकटेश दत्ता ने कहा कि ई-कचरे के आविष्कार के एक उचित तरीके को विकसित करने और समय-सीमा के अंदर ही ई-कचरे के प्रभावी प्रबंधन के लिए एक रणनीति बनाने की आवश्यकता है।

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