कांग्रेस की चूक दर चूक

Opinion

राजीव खण्डेलवाल
जम्मू कश्मीर के पुलवामा में पिछले माह हुई आतंकी घटना में 40 सैनिकों के शहीद हो जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप पाकिस्तान में घुसकर बालाकोट में किये गये हवाई हमलों के द्वारा जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी कैम्प (प्रशिक्षण शिविर) को नष्ट करने के बाद सम्पूर्ण देश ने एकजुट होकर सेना व सरकार को बधाई दी थी। कांग्रेस सहित समस्त राजनीतिक पार्टियों ने सेना के पराक्रम व अदम्य साहस की प्रशंसा कर बधाई दी थी। एक स्वर से यह कहा गया कि हर हाल में पाकिस्तान को माकूल जवाब देने के लिए वे सरकार व देश के साथ खड़े हैं। कांग्रेस ने बधाई देने में यद्यपि थोड़ी-सी कंजूसी अवश्य बरती। पार्टी ने सेना को तो खुलकर बधाई दी, नमन किया, लेकिन सरकार के प्रति उतनी उदारता नहीं बरती (शायद चुनाव सिर पर है इसलिए)। यद्यपि संकट की इस घड़ी में कांग्रेस ने सरकार के साथ खड़ा होने का वादा किया था (जो बाद में मात्र नाटक सिद्ध हुआ)। लेकिन उसने वैसी उदारता नहीं दिखाई, जैसी वर्ष 1971 में बांग्लादेश बनने के समय अटल जी ने इंदिरा गांधी के प्रति दिखाई थी। तब भी सेना लड़ी थी और अब भी सेना ही ने बहादुरी दिखाई। यद्यपि दोनों वक्त आक्रमण (सेना भेजने) का निर्णय राजनीतिक नेतृत्व ने ही लिया था। इसलिए आज भी राजनीतिक नेतृत्व को वर्ष 1971 के समान बधाई दी जानी चाहिए थी। लेकिन सरकार के नेतृत्व को बधाई देने में कांग्रेस से यह चूक हुई। पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस लगातार बड़ी-बड़ी चूक करती रही है। अब कांग्रेस के नेताओं में बालाकोट हवाई हमले का साक्ष्य मांगने की होड़ मची हुई है। धीरे-धीरे समस्त प्रमुख विपक्षी दल भी इसमें सुर मिलाते जा रहे हैं। हद तो तब हो गई जब कांग्रेस के नेता बी.के. हरिप्रसाद ने पुलवामा व बालाकोट घटना को नरेन्द्र मोदी व इमरान खान के बीच मैच फिक्सिंग करार दे दिया। महत्वपूर्ण यह कि घटना के तत्काल बाद कांग्रेस ने किस बात के लिए सेना की प्रशंसा की थी व बधाई दी थी। साफ झलकता है। यदि ऐसा नहीं था तो उसे नकारे अथवा बधाई का कारण देश को बताया जाना चाहिए। दो दिन बाद ऐसा क्या हो गया कि कांग्रेस सहित समस्त विपक्ष ने रूख बदल दिया। वे हवाई हमले तथा उसमें हुए संहारण के न केवल साक्ष्य मांगने लगे, बल्कि घटना पर ही शक की उंगली उठाने लगे हैं। वे अपने बयानों से भारत में न केवल बयानवीर बने अपितु पाकिस्तानी मीडिया के जाने-अनजाने हीरो बन गए। क्या यही देशभक्ति है? अब सत्ताधारी पार्टी व विपक्ष दोनों पक्ष सेना पर राजनीति करने के आरोप-प्रत्यारोप एक-दूसरे पर लगा रहे हैं। बेशक दोनों ही पक्ष पूरी क्षमता, ताकत व निर्लजता के साथ राजनीति कर रहे हैं। घटना का राजनीतिकरण करने में सबसे पहला कदम भाजपा की तरफ से ही उठा। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस.येदियुरप्पा ने कहा कि हवाई हमले से पार्टी को कर्नाटक में 25 में से 22 सीटों पर फायदा होगा। तत्पश्चात भाजपा के राष्टï्रीय अध्यक्ष ने कहा कि 250 से अधिक आतंकी मारे गए (तब तक सेना व सरकार ने ऐसा कोई खुलासा नहीं किया था)। प्रधानमंत्री रैलियों में कह रहे हैं कि पाताल से आंतकियों को खोद निकालेंगे। लेकिन कब और कितने शहीद हो जाने के बाद? पता नहीं? न बताएंगे? अब मोदी जी भारत की बजाय ‘विजयी भारत’ की जय के नारे लगवा रहे हैं। अभी कौन-सी विजय मिल गई, जिस कारण विजयी भारत के नारे? यदि बालाकोट विजय है, तो उसके तत्काल बाद से लगातार हो रही संघर्षविराम उल्लंघन एवं आतंकी घटनाएं और उनमें हुए शहीदों व नागरिकों की मृत्यु को क्या कहना चाहेंगे। जब सेना के तीनों अंगों के द्वारा संयुक्त प्रेसवार्ता करके एयर स्ट्राइक कार्यवाही की विस्तृत जानकारी दे दी गई, तब साक्ष्य मांगते रहने का क्या औचित्य रह जाता है। विशेषकर उस स्थिति में जब कांग्रेस सेना के शौर्य को लगातार स्वीकार करती आ रही है। यही राजनीति है। साफ है, बयानों के द्वारा सेना पर विश्वास परन्तु कार्यरूप में अविश्वास जता रहे हैं। यदि एयर स्ट्राईक की कार्यवाही की जानकारी पत्रकार वार्ता करके सरकार देती, तो आप शायद उसे स्वीकार ही नहीं करते। फिर भी सेना पर राजनीति करने के तरीकों में भाजपा व विपक्षी पार्टियों में जमीन-आसमान का अंतर है। सेना पर भाजपा ने आसमानी राजनीति अर्थात ऊंचाई की राजनीति की है। भाजपा सेना का चुनावी दृष्टि से फायदा लेने के लिए ‘मुद्दे’ का राजनीतिकरण करने के बावजूद देश, देशहित और राष्ट्रवाद के साथ मजबूती से जनता के सामने खड़ी हुई दिख रही है। दूसरी ओर साक्ष्य मांगने हेतु जिस तरह की अमर्यादित भाषा कांग्रेस प्रयोग कर रही है, वह उनके देशभक्त भारतीय नागरिक होने पर ही संदेह पैदा कर रहे हैं। उनके बयानों से विश्व में भारत का पक्ष कमजोर होता जाता है। पाकिस्तान उन बयानों को अपने मीडिया में सुर्खियां बनाकर हमारी सेना व सरकार के दावे की विश्व पटल पर हवा निकाल रहा है। जिस प्रकार विदेश राज्यमंत्री वी.के.सिंह ने बी.एस.येदियुरप्पा के बयान से असहमति दिखाई है। ठीक वैसे ही कांग्रेस पार्टी को करना चाहिए था। उसे पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह के बयान से सीख लेनी चाहिए। उन्होंने कहा था, एक मरे या 100 मरें, यह साफ संदेश जोरदार तरीके से गया है कि भारत निर्दोष जवानों और नागरिकों की शहादत बेकार नहीं जाने देगा। येदियुरप्पा से 22 सीटों के जीतने के बयान पर प्रश्न किया जाना चाहिए। अमित शाह से पूछा जा सकता है कि सेना व सरकार द्वारा कोई आंकड़ा नहीं देने के बावजूद 250 संख्या की जानकारी उन्हें कहां से मिल गई। चुनाव बाद वह फिर तो नहीं कहेंगे कि 250 की संख्या तो जुमला था। चुनावी रैलियों में शहीदों की फोटो के उपयोग पर भी प्रश्न किया जा सकता है। खुफिया एजेंसी की विफलता पर भी प्रश्न उठाया जा सकता है। उरी के बाद पुलवामा क्यों व आगे क्या? इस विफलता पर भी प्रश्न उठाये जाने चाहिए। इन सब प्रश्नों के साथ अपने देशप्रेम व निष्ठा पर आंच आने दिए बिना कांग्रेस भाजपा को कठघरे में खड़ा करके बेहतर सफल राजनीति कर सकती थी। लेकिन उक्त आतंकी घटना को ‘दुर्घटना कहना, हवाई हमलों को जंगल में ब्लास्ट कर पेड़ व पहाड़ों से बदला लेना, अंतरराष्ट्रीय मीडिया के हवाले से घटना के वजूद पर ही शक जाहिर करना, यह सब परिपक्व राजनीति का घोतक नहीं है। ऐसे व्यवहार का खामियाजा आने वाले लोकसभा चुनाव में निश्चित ही कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा व पडऩा भी चाहिए। बालाकोट हवाई हमले को लेकर सेना पर विश्वास करने के बाद, सबूत के नाम पर सरकार को कठघरे में दर्शाने के उद्देश्य से सेना पर ही अपरोक्ष रूप से अविश्वास जताने का कांग्रेस को कौन-सा सियासी फायदा होने वाला है? ऐसे अवांछित व्यवहार से विश्व में हमारी किरकिरी हो रही है। ऐसा ज्ञात होता है कि कांग्रेस का बौद्धिक स्तर गिरता जा रहा है।

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