रमजान पर हिंदू-मुसलमान

Opinion

अभी तो लोकतंत्र के पर्व का आगाज ही हुआ था, उसे पूरी तरह हरकत में आना था, लेकिन उससे पहले ही चुनावों पर सांप्रदायिक रंग पोतने की शुरुआत हो गई। सियासी और मजहबी घमासान शुरू हो गया कि रमजान के दौरान मतदान के मायने ये हैं कि मुसलमानों को उनके मताधिकार से वंचित किया जा रहा है। यह भाजपा की चुनावी साजिश हो सकती है। रमजान के दौरान मुसलमान कम वोटिंग कर पाएंगे, जिसका सीधा फायदा भाजपा और व्यापक संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी को होना तय है। उफ्फज्मतदान भी हिंदू-मुस्लिम हो गया! कैसा इल्जाम है यह? चूंकि चुनावी तारीखों-6,12,19 मई के दिन रमजान के रोजे जारी रहेंगे, लिहाजा एक राजनीतिक तबके की दलीलें हैं कि मतदान की तारीखें बदली जाएं। देश में 20 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली कुल 72 लोकसभा सीट हैं। इन सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। उप्र, बिहार और पश्चिम बंगाल में ऐसी सीटें कुल 47 हैं। रमजान के दौरान सिर्फ 14 सीटों पर ही वोटिंग होनी है। शेष सीटों पर मतदान हो चुका होगा। देशभर में रमजान के दौरान 169 सीटों पर मतदान होगा। कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों का आकलन है कि करीब 31 फीसदी मतदान पर असर पड़ेगा। कुतर्क और दुष्प्रचार इस हद तक किए जा रहे हैं कि एक ‘नंगे’ साधु को तमाम सहूलियतें हासिल हैं, लेकिन मुसलमानों के लिए कुछ भी नहीं। साधु पर ऐसे विशेषण इस्तेमाल किए गए, लिहाजा कुछ टीवी चैनलों ने उन्हें बहस से ही आउट कर दिया। बहरहाल इसे यहीं छोड़ते हुए दूसरे आयाम पर आना चाहिए। दरअसल सियासत मुस्लिम वोट बैंक को लेकर खेली जा रही है। माना जा सकता है कि रमजान के मुबारक महीने के दौरान मुसलमान रोजा रखते हैं, भूख-प्यास के कारण कमजोरी और थकान महसूस करते हैं, लेकिन उसके मायने ये नहीं हैं कि वे तमाम काम-धंधे, नौकरी, पेशा छोड़कर घर पर ही बैठे रहते हैं। ऐसा बयान मुस्लिम नेता-सांसद ओवैसी ने भी दिया है और इसे गैर-जरूरी विवाद करार दिया है। रोजे की तरह व्रत हिंदू और अन्य धर्मावलंबी भी रखते हैं। मतदान के पहले दिन 11 अप्रैल को ही चैत्र नवरात्रि का पावन त्योहार पड़ रहा है। 14 अप्रैल को राम नवमी का दिन है। उस दौरान असंख्य आस्थावान हिंदू उपवास भी रखते हैं। तो क्या मतदान की उन तारीखों को भी बदला जाए? इसी दौरान 17 अप्रैल को जैनियों के लिए ‘महावीर जयंती’ एक बड़ा त्योहार है। तमिलनाडु में 8 से 22 अप्रैल तक मीनाक्षी त्योहार मनाया जाएगा। 18 अप्रैल को ‘गुड फ्राइडे’ है और मतदान के अंतिम दौर तक जाएं, तो 18 मई को ‘बुद्ध पूर्णिमा’ है। त्योहारों और पर्व के अलावा मतदान की तारीखों के बीच फसल बोने का सीजन भी उफान पर होगा। आजीविका जरूरी है या मतदान को जाना जरूरी है। भारत में चुनावों के इतिहास की एक पुरानी जानकारी सामने आई है कि 1962 के चुनाव भी रमजान के दौरान कराए गए थे, लेकिन तब किसी ने विरोध नहीं किया था। बंगाल में ममता बनर्जी के शासनकाल में ही पंचायत चुनाव रमजान के दौरान हुए थे। तब ‘दीदी’ ने उछल-कूद नहीं की। उत्तर प्रदेश में कैराना उपचुनाव भी रमजान के दौरान कराए गए थे और साझा विपक्ष ने जीत हासिल की थी। तब विपक्ष ने यह सवाल क्यों नहीं उठाया? बहरहाल निर्वाचन आयोग ने स्पष्टीकरण दिया है कि रमजान में पूरे महीने चुनाव टालना संभव नहीं है, लेकिन शुक्रवार को या त्योहार के दिन वोटिंग नहीं रखी गई है। साफ है कि चुनाव आयोग ने हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि सभी समुदायों का ख्याल रखा है कि उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस न लगे और मतदान भी पर्याप्त संख्या में हो। धर्मनिरपेक्षता के कुछ मुखौटे हैं, जो इस बार भी चिल्ला रहे हैं और भाजपा को फायदे का राग अलाप रहे हैं। कुछ ने तो आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री मोदी के इशारे पर चुनाव आयोग ने मतदान की ऐसी तारीखें तय की हैं। अरे, किसी संवैधानिक संस्था और उसकी तटस्थ ईमानदारी पर तो भरोसा करो। सवाल और आपत्तियां ममता बनर्जी, शरद पवार, अखिलेश यादव और केजरीवाल की पार्टियों ने उठाए हैं, जो किसी भी सूरत में मुसलमानों के वोट बटोरना चाहती हैं। कांग्रेस भी इस मुहिम में शामिल है। चुनाव आयोग ने जब चुनावों पर सर्वदलीय बैठक बुलाई थी, तब किसी ने रमजान के दौरान मतदान पर आपत्ति दर्ज नहीं कराई थी। अब चुनाव का पूरा कार्यक्रम घोषित हो चुका है, तो विपक्ष कपड़े फाड़ रहा है कि हमारा मुसलमान तो वोट डालने नहीं जाएगा। कमोबेश आम चुनाव के मौके पर तो यह सांप्रदायिक खेल छोड़ देना चाहिए।

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