‘‘ भारत के इतिहास को ही बदलने स्वामी दयानंद ’’

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195 वर्ष पूर्व टंकारा गुजरात में 12 फरवरी सन् 1824 को श्री कर्षण जी तिवारी तथा श्रीमती यशोदा बेन के घर एक विलक्षण बालक ने जन्म लिया। माता-पिता को यह आभास भी नहीं था कि यह बालक बड़ा होकर भारत के इतिहास को ही बदल देगा। जैसे-जैसे बालक बड़ा होता गया, विधि के विधान ने अपना कार्य इस बालक के द्वारा प्रकट करना शुरू कर दिया। शिवरात्रि तो प्रति वर्ष आती है परन्तु उस वर्ष की शिवरात्रि ने एक क्रांतिकारी विचारधारा को जन्म दे दिया और बालक मूलशंकर के मन में सच्चे शिव को जानने और समझने की एक तीव्र इच्छा उत्पन्न कर दी। कर्षण जी तिवारी को जब पता लगा कि मूलशंकर वैराग्य के रास्ते पर अग्रसर हो रहा है तो उन्होंने अपने सुपुत्र को विवाह-बंधन में बांधने का निश्चय किया परन्तु भविष्य के गर्भ में तो कुछ और ही छिपा था। मूलशंकर जी ईश्वर प्राप्ति के अपने लक्ष्य की ओर बढऩे के लिए घर से निकल गए और कालांतर में स्वामी पूर्णानंद जी महाराज ने संन्यास प्राप्त कर मूलशंकर स्वामी दयानंद के नाम से विख्यात हुए।

स्वामी दयानंद का लक्ष्य उस सच्चे गुरु के श्रीचरणों में पहुंचना था जो उन्हें जीवन और मृत्यु की सच्चाई से परिचित करा सके। उनकी खोज मथुरा में स्वामी विरजानंद जी के श्रीचरणों में जाकर पूरी हुई। गुरु जी के सान्निध्य में वैदिक शिक्षा पूर्ण कर इन्होंने जब जाने की आज्ञा मांगी तो गुरु विरजानंद जी ने गुरु दक्षिणा में उनका जीवन वेदोद्धार के लिए मांग लिया। इस विलक्षण शिष्य ने भी उसी सरलता का परिचय देते हुए गुरु आज्ञा का पालन करने के लिए अपना जीवन वेदोद्धार के लिए समर्पित कर दिया।

जिस समय दयानंद जी ने अपने गुरु को गुरु दक्षिणा के रूप में स्वयं को सौंपा तब भारतवर्ष में ब्रिटिश साम्राज्यवाद को उखाड़ फैंकने के लिए क्रांति की चिंगारी सुलग कर ज्वाला बन चुकी थी।स्वामी जी जानते थे कि बीमारी का नाश करने के लिए उसके कारणों को समाप्त करना आवश्यक है अत: उन्होंने भारतवासियों की शारीरिक, तथा मानसिक दास्ता के कारणों पर विचार करके उनका समूल नाश करने का निश्चय किया। इस समस्या का गहन अध्ययन करने पर स्वामी जी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि देशवासियों के मन से इस हीनभावना को दूर करने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में आमूल-चूल परिवर्तन करने होंगे। सन् 1875 में आर्य समाज की स्थापना के बाद उनके अनुयायियों ने महर्षि दयानंद जी के इस दूरदृष्टि पूर्ण आदेश को मानते हुए यह निश्चय किया कि भारत में दयानंद एंग्लो वैदिक शिक्षण प्रणाली लागू की जाए जिससे हम में स्वाभिमान की भावना जागे और हम अपने पूर्वजों के बताए हुए रास्ते पर चलकर भारत का गौरव बढ़ा सकें।

इसीलिए महात्मा हंसराज जी के नेतृत्व में वैदिक पद्धति पर आधारित आधुनिक शिक्षा प्रणाली शुरू की गई जिसे आज डी.ए.वी. शिक्षा संस्थान बड़ी श्रद्धा से आगे बढ़ा रहे हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न समाजों ने भी अपने-अपने शहर व प्रांत में ऐसी ही शिक्षण प्रणाली चलाई है। आर्य समाज और डी.ए.वी. संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे विद्यालयों और महाविद्यालयों में आज लाखों विद्यार्थी अपनी शिक्षा पूर्ण करके देश की उन्नति में अपना योगदान दे रहे हैं और इसी शृंखला में आर्य समाज मॉडल टाऊन लुधियाना द्वारा सन् 1955 में आर्य समाज मॉडल टाऊन लुधियाना के संस्थापक महाशय संतराम जी स्याल के नेतृत्व में संस्कृत विद्यालय की स्थापना की गई जिसे आज आर.एस. माडल स्कूल के नाम से जाना जाता है।  यही नहीं सन् 1977 में आधुनिक शिक्षा प्रणाली के अनुसार बी.सी.एम. आर्य माडल सीनियर सैकेंडरी स्कूल की नींव रखी गई। आज ये दोनों विद्यालय राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध विद्यालयों में शामिल हो चुके हैं।

स्वामी दयानंद जी ने यह भी देखा कि समाज की मुख्य धरी अर्थात महिलाएं ही सबसे अधिक अंधश्विासी हैं और उनके अज्ञान की जड़ अशिक्षा है इसलिए हिंदू और मुसलमान दोनों वर्गों के कई विरोध का सामना करके भी उन्होंने स्त्री शिक्षा का समर्थन किया। आर्य समाज की स्थापना द्वारा उन्होंने विधवा विवाह, पुनर्विवाह आदि की मान्यता तो दिलवाई ही, साथ ही नारी को शिक्षा तथा समानता का अधिकार देकर उन्हें यज्ञ करने का भी अधिकार दिया।

महर्षि जी के निर्देशानुसार आज भारतवर्ष ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व के अलग-अलग भागों में भी लड़के-लड़कियों के लिए गुरुकुल स्थापित किए गए हैं। हिंदी माध्यम में उच्च शिक्षा देने के लिए तो गुरुकुल कांगड़ी पूरी दुनिया में प्रसिद्धि पा रहा है। 20वीं शताब्दी की शुरूआत में जो असंख्य प्राकृतिक आपदाएं आईं, उनमें दयानंदी आर्यसमाजी सेवकों ने दुखी लोगों के दुख अपने सेवा भाव और सहायता कार्यों से दूर किए हैं। भारत की आजादी के संघर्ष में तो 80 प्रतिशत स्वाधीनता सेनानी आर्य समाज से जुड़े हुए थे ही, लेकिन उसके बाद भी आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा की व्यवस्था करके उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोडऩे का कार्य करके आर्य समाज ने सच्चे देश सेवक होने का परिचाय दिया है। नि:संदेह इन सब में स्वदेश और स्वराज्य के मूल प्रेरक स्वामी दयानंद जी के विचार ही क्रियान्वित हो रहे हैं। आश्चर्य है कि मात्र 59 वर्ष के लघु जीवनकाल में उन्होंने कितने कार्य कर दिखाए। उन्होंने पाखंड की गंदगी को हटाकर मानसिक स्वच्छता का विचार आपने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ नामक ग्रंथ में देकर समाज में एक नई विचारधारा की शुरूआत की लेकिन स्वामी दयानंद जी के इहलोक से विदा होते ही आज हम पुन: उसी स्थान पर पहुंच गए हैं, जहां सन् 1875 से पहले थे। इसलिए आवश्यकता है कि स्वामी जी के अनुयायियों को समय की मांग को समझते हुए पुन: समाज से बुराइयों को समाप्त करके भारतवर्ष का मार्गदर्शन करना होगा क्योंकि आज विश्व आर्य समाज की ओर देखकर फिर-पुकार लगा रहा है और कह रहा है, ‘‘लौटो दयानंद, एक बार फिर लौटो।’’

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