लौकिक एवं पारलौकिक जीवन की सम्पूर्णता के लिए: दीपक

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कुंभ नगरी (प्रयागराज)। लौकिक और पारलौकिक दो ऐसे शब्द हैं जो हमारे जीवन के सम्पूर्णता को लिये हुये हैं अर्थात् हमारा सम्पूर्ण जीवन दो भागों में बंटा हुआ है जिसमें नीचे से ऊपर को अथवा झूठ से सच की ओर चलने पर पहला लौकिक और दूसरा पारलौकिक है। उक्त बातें सन्त ज्ञानेशामी सदानन्द जी परमहंस से तत्वज्ञान प्राप्त महात्मा दीपक ने कुम्भ मेला के सेक्टर 14 स्थित सदानन्द तत्वज्ञान परिषद के शिविर में भक्तों को सत्संग के दौरान संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि लौकिकता में जिस प्रकार शरीर, परिवार और संसार तीनों ही दिखाई दे रहा है, ठीक उसी प्रकार पारलौकिकता वाले जीव, ईश्वर और परमेश्वर तीनों दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि शरीर, परिवार व संसार प्रधान जीवन लौकिक जीवन है तो दूसरे तरफ जीव, ईश्वर व परमेश्वर प्रधान जीवन पारलौकिक जीवन कहलाता है। यह लौकिक शब्द जिसका सीधा अर्थ है लौकना यानी दिखाई देना, दोनों तरफ है जिनके बीच में एक ‘पार’ शब्द आया हुआ है। इस पार वाले ‘लौकिक जीवन’ में जिस प्रकार शरीर, परिवार और संसार रूप तीन श्रेणियां दिखाई दे रही हैं, ठीक उसी प्रकार उस पार वाले यानी पारलौकिक जीवन में भी जीव, ईश्वर और परमेश्वर तीन श्रेणियों में दिखाई देती हैं। उन्होंने कहा कि हर कोई किसी न किसी प्रकार का जीवन जी रहा है किन्तु किसी प्रकार का जीवन जीना मनुष्य जीवन का लक्ष्य नहीं। लौकिक और पारलौकिक का जीवन जीना ही मानव योनि का लक्ष्य है जो अपने अस्तित्व व कर्तव्य और मंजिल को जाने, देखे, परखे बिना सम्भव ही नहीं।

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