स्वाइन फ्लू का बढ़ता प्रकोप

Opinion

योगेश कुमार गोयल
देश के विभिन्न राज्यों में स्वाइन फ्लू का प्रकोप कहर बरपा रहा है और आए दिन इस बीमारी के चलते अलग-अलग स्थानों पर अनेक लोगों की जान जा रही हैं। तमाम अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं से लैस देश की राजधानी दिल्ली में ही प्राणघातक बनती जा रही इस बीमारी के 1100 से भी अधिक मामले सामने आ चुके हैं। इसका सर्वाधिक कहर राजस्थान में देखा गया है, जहां इसके चलते बहुत सारे लोग काल का ग्रास बन चुके हैं। यह बीमारी कितनी तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रही है, इसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि जहां 20 जनवरी तक देशभर में स्वाइन फ्लू से संक्रमित लोगों के कुल 2777 मामले सामने आए थे, वहीं अब यह संख्या 7000 का आंकड़ा भी पार कर चुकी है। राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, तेलंगाना इत्यादि के अलावा हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्य भी इसके प्रकोप से नहीं बच सके हैं। पर्वतीय इलाकों में भी जिस प्रकार स्वाइन फ्लू का प्रकोप बढ़ रहा है, उसके मद्देनजर यह समझने की जरूरत है कि इसे कोई मौसमी बीमारी मानकर अनदेखी करने के परिणाम कितने भयावह साबित हो सकते हैं। अगर पिछले कुछ वर्षों में स्वाइन फ्लू के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2012 से 2018 के बीच प्रतिवर्ष क्रमश: 5044, 5253, 937, 42592, 1786, 38811, 14992 मामले सामने आए थे। प्रतिवर्ष क्रमश: 405, 699, 218, 2990, 265, 2270, 1103 लोगों की मौत हुई थी। पिछले वर्ष दिल्ली में स्वाइन फ्लू के 205 मामले सामने आए थे किन्तु इस साल अभी तक 1100 से ज्यादा ऐसे मामले दर्ज किए जा चुके हैं। डॉक्टरों द्वारा आशंका जताई जा रही है कि इस बीमारी के फैलने के लिए प्रदूषण और कम तापमान भी जिम्मेदार हो सकते हैं। सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि प्रदूषण के चलते स्वाइन फ्लू का वायरस साल दर साल अपनी प्रकृति में बदलाव कर और घातक होता जा रहा है। वल्र्ड ऑर्गनाइजेशन फॉर एनिमल हेल्थ की एक रिपोर्ट में कहा भी गया है कि यह वायरस अब केवल सूअरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने इंसानों के बीच फैलने की ताकत भी हासिल कर ली है। चूंकि इस बीमारी का वायरस ठंड में ज्यादा फैलता है, इसलिए पिछले कुछ वर्षों से हर साल सर्दी के मौसम में स्वाइन फ्लू के मामले सामने आते रहे हैं। इसके बावजूद स्वास्थ्य तंत्र द्वारा आम आदमी के प्राणों को लीलती इस जानलेवा बीमारी से बचने के लिए समय रहते एहतियातन कोई उपाय नहीं किए जाते। हमारी सरकारें और स्वास्थ्य विभाग प्राय: तभी गहरी नींद से जागते हैं, जब कोई बीमारी महामारी बनकर दस्तक देती है। अक्सर देखा गया है कि जब भी मौसम अथवा अन्य किसी कारण किसी बीमारी का प्रकोप कम होने लगता है तो सरकार यह सोचकर निश्चिंत हो जाती है कि समस्या खत्म हो गई है। जब वही बीमारी विकराल रूप धारण कर पुन: सामने आती है तो सरकारों और स्वास्थ्य तंत्र के हाथ-पैर फूल जाते हैं। बेहतरी इसी में है कि स्वाइन फ्लू हो या डेंगू अथवा जीका या ऐसी ही अन्य कोई बीमारी, समय रहते उनसे बचाव के पूर्व प्रबंध कर लिए जाएं, साथ ही लोगों को इन बीमारियों और इनसे बचाव को लेकर जागरूक किया जाए। स्वाइन फ्लू वायरस हवा के जरिये वातावरण में फैलता है, जिसके शुरुआती लक्षण सामान्य बुखार के रूप में सामने आते हैं। किसी शुष्क स्थान या ठोस सतह पर यह वायरस 24 घंटे तक जीवित रह सकता है जबकि किसी तरल स्थान पर यह मात्र 20 मिनट ही जीवित रह सकता है। यह वायरस जानलेवा नहीं होता किन्तु श्वसन तंत्र को बुरी तरह प्रभावित कर देता है, इसलिए फेफड़े के रोगियों के लिए यह खतरनाक हो सकता है। चूंकि यह वायरस वातावरण में ठंड तथा नमी बढऩे पर तेजी से फैलते हैं, इसलिए दिन तथा रात के तापमान में गिरावट के कारण सर्दी के मौसम में स्वाइन फ्लू के मामले तेजी से बढ़ते हैं। हालांकि 2009 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा स्वाइन फ्लू को महामारी करार दिया गया था किन्तु अधिकांश चिकित्सकों का मानना है कि अगर समय रहते स्वाइन फ्लू के लक्षणों की पहचान कर ली जाए और कुछ जरूरी टेस्ट करवाने के साथ-साथ तुरंत इलाज की प्रक्रिया भी शुरू कर दी जाए तो इससे निपटना सहज हो जाता है। आदमी के लिए सामान्य फ्लू या खांसी-जुकाम, बुखार और स्वाइन फ्लू में अंतर कर पाना मुश्किल होता है। इस तरह की आशंका होने पर उपचार में लापरवाही के बजाय चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए। वास्तव में यह कोई जानलेवा बीमारी नहीं है बल्कि हमारे श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारी है, जो एच1एन1 वायरस से होती है। स्वाइन फ्लू एक आम फ्लू या सर्दी-जुकाम की तरह ही है, जो खांसने, छींकने या सांस के जरिये फैलता है और थोड़ी सी सावधानी बरतने से ही इससे बचा जा सकता है। चिकित्सकों का कहना है कि स्वाइन फ्लू के वायरस से संक्रमत होने के बाद 2-4 दिन में बीमारी के लक्षण दिखने लगते हैं और बीमारी का लक्षण दिखाई देने के 48 घंटे के भीतर इसका इलाज जरूर शुरू करा लेना चाहिए। समय ज्यादा बीतने पर दवा ज्यादा कारगर साबित नहीं होती। अगर समय रहते इलाज न मिले तो स्वाइन फ्लू का वायरस फेफड़ों पर वार करने के बाद रोगी के लीवर, किडनी, हृदय तथा मस्तिष्क पर भी हमला करता है। यह स्थिति जानलेवा साबित होती है। स्वाइन फ्लू के प्रमुख लक्षणों में आमतौर पर बुखार, तेज ठंड लगना, गले में खराश और दर्द, मांसपेशियों में दर्द या अकडऩ, तेज सिरदर्द, खांसी, कफ बनना, कमजोरी महसूस होना, नाक बहना, छींकें आना इत्यादि शामिल हैं। इसके अलावा बच्चों में स्वाइन फ्लू के जो लक्षण दिखाई देते हैं, उनमें तेज सांस चलना या सांस लेने में तकलीफ होना, त्वचा के रंग में बदलाव आना, लगातार उल्टियां होना, बिल्कुल प्यास न लगना इत्यादि प्रमुख हैं। नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के मुताबिक जो व्यक्ति पहले से ही किसी बीमारी से लंबे समय से जूझ रहे हैं या जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम है, उनके इस बीमारी की चपेट में आने की आशंका अधिक रहती है। इसके अलावा छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं को भी इसका खतरा बरकरार रहता है। चिकित्सकों का कहना है कि इस बीमारी से बचने के लिए अगर बचाव के पर्याप्त उपाय अपनाए जाएं तो इससे घबराने की जरूरत नहीं है। स्वाइन फ्लू से संक्रमित रोगी को अपना मुंह ढककर रहना चाहिए ताकि वायरस दूसरों को संक्रमित न कर सके। संक्रमण से बचाव के लिए हाथ बार-बार धोते रहें और अपने घर में या आसपास साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखें। जहां तक संभव हो, स्वाइन फ्लू प्रभावित इलाकों में भीड़-भाड़ वाले स्थानों से बचें या ऐसे स्थानों पर मुंह पर मास्क लगाकर ही निकलें। स्वाइन फ्लू से संक्रमित हो जाने पर खुद से कोई दवा लेने के बजाय डॉक्टर से सम्पर्क करें और तरल पदार्थ ज्यादा से ज्यादा मात्रा में लें। इस्तेमाल किए हुए टिश्यू पेपर, नेपकिन इत्यादि खुले में न फेंकें। स्वाइन फ्लू की अभी तक कोई वैक्सीन नहीं बनी है, रोगी को एंटीवायरल दवाईयां ही दी जाती हैं। संक्रमित व्यक्तियों को प्राय: लक्षणों से राहत पाने की दवाइयाँ दी जाती है लेकिन अगर किसी को दीर्घकालिक रोग होता है तो गंभीर स्थिति से बचाने के लिए उसे वायरस रोधी दवाईयां दी जाती है। वैसे कुछ घरेलू नुस्खे भी स्वाइन फ्लू से बचाव में कारगर साबित होते हैं। संक्रमित हो जाने पर ज्यादा से ज्यादा समय आराम करें ताकि आपका प्रतिरोधी तंत्र खुद इस बीमारी से लड़ सके। बीमारी के लक्षणों से राहत पाने के लिए तुलसी-अदरक वाली चाय और लहसुन का रस फायदेमंद रहता है। डिहाइड्रेशन से बचने के लिए पानी, शर्बत या अन्य तरल पदार्थ जितना ज्यादा पी सकें, बेहतर रहेगा।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *