कैसे मिला शुक्राचार्य को भगवान शिव के पुत्र होने का दर्जा

ज्योतिष

दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य के बारे में तो सब जानते ही हैं। महाभारत जैसे ग्रंथों में इनकी कई कथाएं वर्णित हैं। लेकिन आज हम आपको इनसे जुड़े एक खास प्रसंग के बारे में बताने जा रहे हैं। जिसमें ये बताया गया है कि कैसे असुरों के गुरु को भोलेनाथ के पुत्र होने का दर्जा मिला था। तो चलिए जानते हैं इस पौराणिक कथा के बारे में-शुक्राचार्य के बारे में एक कथा इस प्रकार है कि एक बार शुक्राचार्य ने किसी तरह छल-कपट से कुबेर की सारी संपत्ति को चुरा लिया। जब ये बात कुबेर को पता चली तो वे तुरंत भगवान शिव के पास शुक्राचार्य की शिकायत करने पहुंच गए। कुबेर की बातों के सुनकर भोलेनाथ को बहुत गुस्सा आया। वे शुक्राचार्य को उसके किए की सज़ा देना चाहते थे। लेकिन जैसे ही शुक्राचार्य को ये मालूम हुआ कि उनके विरुद्ध शिव जी तक शिकायत पहुंच गई तो वे डर गए और उनके क्रोध से बचने के लिए झाडिय़ों में जा छिपे। आखिर एक दिन भगवान शिव ने शुक्राचार्य को ढूढ़ निकाला और जैसे ही उन्होंने शुक्राचार्य को देखा उनका गुस्सा ओर ज्यादा बड़ गया। शुक्राचार्य को देखते ही भगवान ने उसे निगल लिया। शिव जी की देह में पहुंचने के बाद शुक्राचार्य का दम घुटने लगा। उन्होंने महादेव से प्रार्थना की कि वे उनको अपनी देह से बाहर कर दें अन्यथा वे मर जाएंगे। लेकिन शिव जी का क्रोध शांत नहीं हुआ। उन्होंने गुस्से में आकर अपने शरीर के सभी द्वार बंद कर दिए। अंत में शुक्राचार्य मूत्रद्वार से बाहर निकल आए और इसी वजह से शुक्राचार्य पार्वती-परमेश्वर के पुत्र समान हो गए। शुक्राचार्य को बाहर निकले देखकर शिव जी का क्रोध फिर से भड़क उठा। वे शुक्राचार्य की कुछ हानि करें लेकिन इसी बीच पार्वती ने भोलेनाथ से निवेदन किया कि अब ये तो हमारे पुत्र समान हो गया है। इसलिए इस पर आप क्रोध मत कीजिए। यह तो दया का पात्र है। पार्वती की प्रार्थना पर ही भगवान ने शुक्राचार्य को पहले से अधिक तेजस्वी बना दिया।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *