मोदी का चुनावी स्टंट

Opinion

अब मोदी सरकार का यह नया नारा होना चाहिए। विकास का नारा 2014 के आम चुनाव तक था। बेशक देश ने विविध क्षेत्रों में विकास किया है, लेकिन रोजगार और कारोबार में गिरावट हुई है। बीते साल में भारत में करीब 2 करोड़ बेरोजगार थे। यह संगठनों की अनुमानित संख्या है और बेरोजगारी दर करीब 3.5 फीसदी रही है, जो सबसे ऊंचे स्तर पर मानी जा रही है। बहरहाल संदर्भ आरक्षण का है, लिहाजा नारा भी नया गढ़ा जाना चाहिए। देश के गरीब अगड़ों को आरक्षण देने का संविधान संशोधन बिल लोकसभा में लगभग एकतरफा तरीके से पारित हुआ है। जब पाठक इस आलेख को पढ़ेंगे, तब तक राज्यसभा भी बिल को पारित कर चुकी होगी। लोकसभा में 326 में से 323 वोट बिल के समर्थन में पड़े। संविधान में 124वां संशोधन कर लिया गया है। अब आरक्षण जाति और धर्म की परिधियां लांघ कर सभी के लिए होगा। आरक्षण हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई सभी समुदायों के गरीबों को उपलब्ध होगा। माना जा रहा है कि अब देश की करीब 95 फीसदी आबादी आरक्षण की पात्र होगी या उससे प्रभावित होगी। नतीजतन ‘सबका साथ’ संभव होगा अथवा नहीं, यह बाद की परिस्थिति है। बेशक लोकसभा में सवर्ण आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस समेत ज्यादातर विपक्षी दलों ने बिल का समर्थन किया, तो उसका पारित होना स्वाभाविक था, लेकिन 323 सांसदों के समर्थन के साथ-साथ नीयत और नीति के सवाल भी उठाए गए। बिल के समय पर अधिकतर ने संदेह जताया। आपत्तियां जताई गईं कि 16वीं लोकसभा की आखिरी घड़ी में ही ऐसा बिल क्यों लाया गया? विधेयक के मसविदे पर सत्तारूढ़ पक्ष के विभिन्न घटकों में भी विमर्श या चर्चा क्यों नहीं की गई? कांग्रेस संसदीय दल के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने तो यहां तक कह दिया कि यह बिल अगले सत्र में भी लाया जा सकता था। गरीबों की मदद हम भी मानते हैं, लेकिन गरीबों के नाम पर चुनाव जीतने की कोशिश करना भी ठीक नहीं है। बसपा, राजद, एमआईएम, अन्नाद्रमुक, ‘आप’ आदि दलों के सांसदों ने इसे ‘चुनावी स्टंट’ करार दिया, लेकिन बसपा ने संशोधन बिल का समर्थन किया और अन्नाद्रमुक ने इसे ‘संविधान की भावना के खिलाफ’ मानकर बहिर्गमन किया। लोकसभा में बसपा का कोई भी सांसद नहीं है, लेकिन यह समर्थन राज्यसभा में उपयोगी रहेगा। दरअसल सामाजिक, राजनीतिक, समरसता की मजबूरियों के तहत सभी प्रमुख दलों को सवर्ण आरक्षण संशोधन बिल का समर्थन करना पड़ा है, क्योंकि देश की करीब 31 फीसदी आबादी सवर्ण है। वे लोकसभा की 125 सीटों पर निर्णायक स्थिति में भी हैं। सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह है कि बीते लंबे वक्त से लगभग हरेक प्रमुख दल गरीब अगड़ों को आरक्षण देने की पैरवी करता रहा है, बेशक राजनीतिक और चुनावी दबाव ही क्यों न हों। अब समान अवसर, सामाजिक संतुलन और समानता के मद्देनजर यह आरक्षण बेहद सकारात्मक साबित हो सकता है। बशर्ते सरकारें रोजगार और नौकरियां मुहैया कराती रहें। देश में हर साल कमोबेश 81 लाख नौकरियों की जरूरत है। ऐसा अध्ययन ‘सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी’ ने किया है। उसके साथ विश्व बैंक का भी मानना है कि बीते 27 महीनों में बेरोजगारी की दर उच्चतम स्तर तक गई है। नए साल 2019 में भी बेरोजगारों की औसतन संख्या करीब 30,000 और बढ़ेगी। आरक्षण का सर्वाधिक लाभ बेरोजगारों को मिलना चाहिए, ताकि आर्थिक खाइयां भरी जा सकें। दरअसल जातिगत आरक्षण ने अगड़ों को आर्थिक तौर पर बेहद विपन्न बना दिया है। दरअसल गरीबी जातिगत नहीं होती, बल्कि परिवार और विरासत में मिलती है। जो जन्मजात गरीब और सवर्ण हैं और शैक्षिक रूप से भी कुछ पिछड़े हैं, वे आजीविका के लिए क्या करें? उम्मीद है कि यह आरक्षण ईमानदारी से लागू होगा, तो सवर्ण भी संपन्न होंगे। इस संशोधन बिल की खूबी यह है कि इसे संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संसद ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर पेश किया था। लिहाजा इस संविधान संशोधन के लिए 15 राज्यों की विधानसभाओं के पास जाने की भी मजबूरी नहीं होगी। यदि इसे 9वीं अनुसूची में रखा गया, तो अदालत भी हस्तक्षेप नहीं कर सकेगी। रास्ता साफ है कि सवर्ण आरक्षण की व्यवस्था जल्दी ही अमल में आ सकती है। उससे शिक्षा के क्षेत्र और उसके स्तर में भी परिवर्तन आ सकते हैं, क्योंकि यह व्यवस्था निजी शैक्षिक संस्थानों पर भी लागू होगी। अब देखना शेष है कि यदि आरक्षण लागू होता है, तो उसकी कौन-सी चुनौतियां सामने आती हैं, क्या टकराव भी होंगे और कुछ सरकारी विसंगतियां भी सामने आएंगी।

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