तय हुआ कि सीबीआई ‘सरकारी तोता’ नहीं

Opinion

इस हफ्ते खबरों की दुनिया में कुछ नया, अजूबा और चौंकाने वाला ऐतिहासिक संयोग बना । एक ओर प्रयागराज में संगम तट पर कुंभ मेले में शामिल होकर किन्नर अखाड़ा चर्चा का विषय बना तो दूसरी ओर सीबीआई के लपेटे में आते दिखे समाजवादी नेता अखिलेश यादव के समर्थन में बसपा नेता खुलकर उनका बचाव करते नजर आए। करीब 23 साल पहले लखनऊ गेस्टहाउस कांड की कड़वाहट में शहद जैसी मिठास घुलती नजर आयी। बुआ ने भरोसा दिलाया, भतीजे घबराना नहीं। बसपा नेता मयावती के इशारे पर अखिलेश यादव के बचाव में उतरे सतीश मिश्रा का अंदाज चौंकाने वाला रहा। क्योंकि खदान पट्टों के इसी मामले में जब गायत्री प्रजापति जैसे तत्कालीन मंत्री सीबीआई के लपेटे में आए थे, तब खुद मायावती ने उनकी गिरफ्तारी का स्वागत किया था। मायावती का यह बदला हुए रूप भविष्य के लिए एक साफ संकेत करता दिख रहा है। संकेत यह कि मायावती ने 2019 के चुनाव में समाजवादी पार्टी से गठजोड़ का पक्का इरादा बना लिया है, तभी बसपा अखिलेश यादव का बचाव करने की रणनीति पर आगे बढ़ निकली है। बसपा के इस रुख से उन खबरों को भी बल मिला, जिनमें सपा-बसपा में सीटों का बंटवारा फाइनल हो जाने की बात कही गयी है। उस खबर के अनुसार सपा बसपा के हिस्से में 37-37 सीटें बतायी जा रही हैं। इसी तरह 2-2 सीटें कांग्रेस, चौधरी अजित सिंह और भाजपा के विद्रोहियों के लिए रखी गयीं हैं।
बसपा का सपा के लिए यह प्रेम भले ही चुनाव नजदीक देखकर चुनावी रणनीति का हिस्सा हो, पर यह गठबंधन न तो चौधरी अजित सिंह को अच्छा लग रहा है और न ही कांग्रेस इसे पचा पा रही है। इस तरह से 80 लोकसभा सीटों वाले सूबे में सबसे पुरानी पार्टी के लिए सिर्फ दो सीट छोड़ा जाना कांग्रेस को बहुत ज्यादा अपमानजनक लग रहा है। कांग्रेस इतने अपमानजनक समझौते में शामिल होने का जरा भी मन नहीं बना पा रही है। खबर आ रही है कि कांग्रेस ने यूपी के अपने 30 से ज्यादा नेताओं को लोकसभा चुनाव में उतारने का संकेत दे दिया है। इसमें इलाहाबाद सीट से प्रमोद तिवारी, कानपुर से श्रीप्रकाश जायसवाल, आगरा से राज बब्बर, सुल्तानपुर से डॉ. संजय सिंह, प्रतापगढ़ से राजकुमारी रत्ना सिंह, वाराणसी से अजय राय, भदोही से राजेश मिश्रा, मिर्जापुर से ललितेश त्रिपाठी, फतेहपुर से अभिमन्यु सिंह, पडरौना से आरपीएन सिंह, देवरिया से अखिलेश प्रताप सिंह आदि नाम प्रमुख हैं। इसके साथ ही खबरें ये भी आ रही हैं कि यूपी में कांग्रेस शिवपाल यादव की पार्टी से तालमेल बनाने का मन बना रही है। उधर, चौधरी अजित सिंह भी उनकी पार्टी को दो सीट मिलने की खबरों से नाराज नजर आए। अगर कांग्रेस सपा बसपा के गठबंधन में शामिल नहीं होती है तब चौधरी अजित सिंह भी कांग्रेस से हाथ मिला सकते हैं। दूसरों को चर्चा में लाने वाली सीबीआई खुद भी इस सप्ताह चर्चा में आ गयी है। कभी जिसे सुप्रीमकोर्ट ने ही सरकारी तोता कहा था, उसी तोते के बारे में मी-लार्ड को नये सिरे से फैसला सुनाना पड़ा है। उसी तोते के अगुवा की याचिका थी कि सरकार का रवैया उसके प्रति ठीक नहीं रहा है …. अब करीब ढाई महीने बाद फैसला आया है कि हां, सीबीआई प्रमुख को सीवीसी की सलाह पर सरकार द्वारा छुट्ïटी पर भेजे जाने का फैसला गलत था। इस फैसले ने एक बात तो स्थापित कर ही दी कि फिलहाल सीबीआई अब सरकारी तोता नहीं रही। इस फैसले से अब उस बेसुरे अलाप की भी हवा निकल गयी जिसमें आरोप लगाया जा रहा है कि खदानों के पट्टों के मामले में सरकार के इशारे पर सीबीआई द्वारा बदनीयती से किसी को परेशान किया जा रहा है। बहरहाल सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद न सिर्फ आलोक वर्मा सीबीआई चीफ की कुर्सी पर वापस लौटे हैं बल्कि सीबीआई जैसी संस्था की साख भी पुनर्स्थापित हुई है। यूपी में खनन घोटाले की जांच के आदेश भले ही हाईकोर्ट ने दिये थे, पर जांच की जद में आ रहे नेता सीबीआई और भाजपा को कोस रहे थे। सुप्रीमकोर्ट द्वारा सीबीआई मुखिया आलोक वर्मा की याचिका पर फैसला सुनाने के बाद अब इस तरह के रुदन की हवा निकल गयी है। वह बात अलग है कि सुप्रीमकोर्ट ने सीबीआई चीफ आलोक वर्मा को अभी आरोपों से मुक्त नहीं किया है। उस पर विचार के लिए एक सप्ताह के भीतर उस कमेटी को बैठना होगा जो सीबीआई चीफ का चयन करती है। उस कमेटी में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विरोधी दल और भारत के मुख्य न्यायाधीश होते हैं।

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