राजस्थान, बदलाव की बहती हवा में बागियों की चुनौती

Opinion

राजस्थान में 7 दिसम्बर को हो रहे चुनाव के लिए भाजपा और कांग्रेस सहित दर्जनों क्षेत्रीय दलों ने बाजी जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंककर मुकाबले को बहुकोणीय बना दिया है। हालांकि इस बार भी सरकार बनाने के लिए चुनावी मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही सीमित रहेगा। हालांकि पहली बार इतने सारे क्षेत्रीय दल भी मैदान में ताल ठोंक रहे हैं, जिससे दोनों प्रमुख दलों के समीकरण गड़बड़ाना तय है। इसके अलावा दोनों दलों के बागी भी इन समीकरणों को प्रभावित करने में निश्चित तौर पर बड़ी भूमिका निभाएंगे। कुल 200 सीटों के लिए 88 दलों के 2294 प्रत्याशी किस्मत आजमाने उतर रहे हैं। इनमें महिला प्रत्याशियों की संख्या सिर्फ 189 है। भाजपा सभी 200 सीटों पर, कांग्रेस 195 पर, उसकी सहयोगी रालोद – एनसीपी तथा एलजेडी शेष 5 सीटों पर, बसपा 190 ,आप 142, भारतवाहिनी 63, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी 58, सीपीएम 28 तथा सीपीआई 16 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं। इसके अलावा दर्जनों छोटे-छोटे दलों के प्रत्याशी तथा 840 निर्दलीय भी मैदान में हैं। रामगढ़ सीट से बसपा प्रत्याशी लक्ष्मण सिंह के निधन के बाद वहां चुनाव स्थगित कर दिया गया है और चुनाव अब 199 सीटों पर ही होना है। इस चुनाव में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया की प्रतिष्ठा दांव पर है। जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं,उनमें सबसे विकट स्थिति भाजपा की राजस्थान में ही है। इस राज्एय में उसकी सत्ता में वापसी मुश्किल मानी जा रही है। दूसरी ओर कांग्रेस के समक्ष सत्ता हासिल करने की बड़ी चुनौती है। पिछले 25 साल से राजस्थान में सत्ता की अदलाबदली का दौर चला आ रहा है। इस बार भी तमाम चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में भी इसी की उम्मीदें लगाई जा रही हैं। 1993 में भाजपा ने चुनाव जीतकर सरकार बनाई थी और भैरो सिंह शेखावत मुख्यमंत्री बने थे। अगले चुनाव 1998 में कांग्रेस ने भाजपा को पटखनी देते हुए अशोक गहलोत के नेतृत्व में सरकार बनाई। फिर 2003 में कांग्रेस को चित्त कर भाजपा सत्तासीन हुई और राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में वसुन्धरा राजे की ताजपोशी हुई। 2008 में कांग्रेस भाजपा पर भारी पड़ी और अशोक गहलोत मुख्यमंत्री की गद्दी पर दूसरी बार आसीन हुए। वर्ष 2013 में वसुन्धरा के नेतृत्व में भाजपा रिकॉर्ड बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल हुई। ढाई दशक से चले आ रहे हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन के इस मिथक को तोडऩा जहां वसुन्धरा के लिए बेहद कठिन चुनौती है, वहीं इस मिथक को बरकरार रखते हुए कांग्रेस के लिए सत्ता के पायदान तक पहुंचना भी बहुत आसान नहीं है। भाजपा हो या कांग्रेस, दोनों ने ही ऐन-केन-प्रकारेण जीत हासिल करने के लिए न केवल चुनाव के ऐन वक्त दलबदलुओं को खुले दिल से अपनाया है बल्कि ढेर सारे नए चेहरों पर भी दांव खेला है। भाजपा ने 7 जबकि कांग्रेस ने 6 और बसपा ने 1 दलबदलू को टिकट थमाई हैं। इस तरह बागियों की भितरघात से जूझना भी दोनों दलों के लिए दुष्कर कार्य हो गया है। कई दर्जन सीटें ऐसी हैं, जहां बागियों ने दोनों पार्टियों की नींद उड़ा रखी है। एंटी इनकमबेंसी फैक्टर की आहट भांपते हुए भाजपा ने अपने कुछ मंत्रियों सहित 60 विधायकों के टिकट काटते हुए 82 नए चेहरों को मैदान में उतारा है। कांग्रेस ने पिछली बार चुनाव लड़ चुके अपने 85 प्रत्याशियों को ही टिकट दिए हैं। शेष 110 सीटों पर नए चेहरे भाजपा के मुकाबले मैदान में हैं। दिलचस्प बात यह है कि विधानसभा की 33 सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस और भाजपा के वही प्रत्याशी एक-दूसरे के मुकाबले मैदान में ताल ठोंक रहे हैं, जो पिछली बार भी इन्हीं सीटों से चुनाव लड़ चुके हैं। इनमें से 29 सीटों पर भाजपा के वर्तमान विधायक हैं जबकि 4 सीटों पर कांग्रेस के। 2013 के चुनाव में भाजपा ने 10.9 फीसदी बढ़त के साथ 45.2 फीसदी मत प्राप्त कर 163 सीटें जीतीं। वह दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में पहुंची। कांग्रेस 3.7 फीसदी घाटे के साथ 33.1 फीसदी मत हासिल कर सकी। उसे महज 21 सीटों पर विजय मिली थी। बसपा का ग्राफ भी 4.2 फीसदी नीचे गिरा था और उसे 3.4 फीसदी मतों के साथ सिर्फ 3 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। 8.2 फीसदी मतों के साथ 7 सीटें निर्दलीयों के खाते में गई थीं। पहली बार मैदान में उतरी कांग्रेस के पूर्व नेता पी. ए. संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी 4.3 फीसदी मतों के साथ 4 सीटें झटकने में सफल रही थी। इस बार एनपीपी के तीन विधायक पाला बदलकर किरोड़ीलाल मीणा के नेतृत्व में भाजपा में शामिल हो गए हैं। 2008 के चुनाव में भाजपा 34.27 फीसदी मत प्राप्त कर 42 सीटों के नुकसान के साथ 78 सीटें हासिल कर सकी थी। तब कांग्रेस 36.82 फीसदी मत और 40 सीटों के फायदे के साथ 96 सीटें प्राप्त कर सरकार बनाने में सफल रही थी। बसपा ने 7.6 फीसदी मतों के साथ 6 सीटों पर कब्जा किया था। कांग्रेस तथा भाजपा ने अपने-अपने घोषणापत्रों में सभी वर्गों के लिए करीब-करीब एक जैसे वादे किए हैं। कांग्रेस ने सरकार बनने के 10 दिनों के भीतर किसानों की ऋण माफी, बुजुर्ग किसानों को पेंशन, कृषि उपकरणों को जीएसटी से राहतए सस्ती बिजली, फसल बीमा, बेरोजगार युवाओं को 3500 रुपये मासिक भत्ता, स्वरोजगार के लिए सस्ती दरों पर कर्ज, पिछड़े परिवारों को एक रुपये प्रति किलो की दर से गेहूं, हर नागरिक को मुफ्त दवाएं, जांच व उपचार, लड़कियों को मुफ्त शिक्षा इत्यादि वादे किए हैं। भाजपा के घोषणापत्र में किसानों को 10 हजार रुपये तक की मुफ्त बिजली, एमएसपी खरीद प्रक्रिया को पारदर्शी बनाते हुए किसानों को फसलों की लागत का डेढ़ गुना दाम, बेरोजगारों को प्रतिमाह पांच हजार रुपये भत्ता, पांच वर्षों में डेढ़ लाख सरकारी तथा 50 लाख निजी रोजगार सृजित करना, 6 लाख से कम सालाना आमदनी वाले परिवारों की लड़कियों की शादी में एक लाख रुपये तक की आर्थिक मदद, सरकारी स्कूलों से सरकारी कालेजों में प्रवेश लेने वाले मेधावी छात्रों को लैपटॉन तथा स्मार्टफोन, गुर्जर- रायका- बंजारा- गाडिया लुहार को विशेष पिछड़े वर्ग का पांच फीसदी आरक्षण दिलाने जैसे वादे किए गए हैं। राजस्थान की राजनीति में जातीय समीकरण बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। यहां हिन्दुओं की आबादी करीब 89 फीसदी है जबकि 9 फीसदी मुस्लिम तथा 2 फीसदी अन्य समुदायों के लोग हैं। इनमें अनुसूचित जाति की आबदी 18, अनुसूचित जनजाति की 13, जाटों की 12, गुर्जरों की 9, राजपूतों की 9, ब्राह्मणों की 7 और मीणा की 7 फीसदी आबादी है। प्रदेश के चुनावों में हर बार विशेषकर तीन जातियां जाट, गुर्जर और राजपूत राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाती रही हैं। राजपूतों और जाटों को एक-दूसरे का धुर विरोधी माना जाता रहा है। जाट, मुसलमान, मीणा तथा अनुसूचित जाति-जनजाति के मतदाता कांग्रेस के परम्परागत समर्थक माने जाते रहे हैं जबकि राजपूत, गुर्जर तथा ब्राह्मण भाजपा के समर्थक। गुर्जर समुदाय को पांच फीसदी आरक्षण देने का वादा पूरा करने में भाजपा नाकाम रही। इसलिए इस समुदाय के लोग भी भाजपा से छिटक रहे हैं। राज्य में करीब 70 फीसदी किसान मतदाता हैं और बार-बार देखा जा रहा किसानों का राष्ट्रव्यापी गुस्सा भाजपा की ख्वाहिशों पर भारी पड़ सकता है। हालांकि मुख्यमंत्री वसुन्धरा की गौरव यात्रा के दौरान भाजपाध्यक्ष अमित शाह ने भाजपा के लिए मिशन- 180 का लक्ष्य रखा था किन्तु मौजूदा हालातों में यह असंभव प्रतीत होता है। पिछले पांच वर्षों में मुख्यमंत्री वसुन्धरा की कार्यशैली से आम जनता के एक बड़े वर्ग के अलावा सरकारी कर्मचारी और भाजपा नेता व कार्यकर्ता परेशान रहे हैं। हालांकि उनके कार्यकाल में अन्नपूर्णा योजना,अक्षय कलेवा, पन्ना धाय, मिड डे मील, भामाशाह, हाडी रानी बटालियन, महिला सशक्तिकरण, जैसी कई महत्वपूर्ण योजनाएं भी चलाई गई। इसके बावजूद किसान आन्दोलन, आरक्षण को लेकर गुर्जरों और जाटों की नाराजगी, गोरक्षा के नाम पर मॉब लींचिंग की बढ़ती घटनाएं, बेराजेगारी, सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ बिना सरकारी अनुमति के जांच पर रोक लगाने का अध्यादेश इत्यादि के अलावा नोटबंदी, जीएसटीए, सीबीआई विवाद जैसे मुद्दे भी मौजूदा सरकार की छवि पर भारी पड़ सकते हैं। कांग्रेस को भी यह चुनाव एक साथ दो मोर्चों पर लडऩा पड़ रहा है। एक भाजपा के खिलाफ और दूसरा बागियों की चुनौती। दो बार मुख्यमंत्री रह चुके अशोक गहलोत, तेजतर्रार युवा नेता प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट, पूर्व केन्द्रीय मंत्री सी पी जोशी इत्यादि कई गुटों में बंटी कांग्रेस को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित न करना भी नुकसान पहुंचा सकता है। अशोक गहलोत पिछड़ी जाति माली से संबंध रखते हैं और राजस्थान की राजनीति के जादूगर माने जाते हैं जबकि सचिन पायलट गुर्जर समुदाय से हैं। इनमें से किसी को भी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर कांग्रेस चुनाव से पहले किसी भी समुदाय की नाराजगी का जोखिम नहीं उठाना चाहती थी। बहरहाल, राजस्थान में बदलाव की बहती हवा में बागियों की चुनौती और ढ़ेर सारे क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी क्या गुल खिलाएगी, यह देखना दिलचस्प रहेगा।

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