भारतीय कृषि के लिए तैयार हो नया पाठ्यक्रम: गजानन डांगे

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अग्निहोत्र से पर्यावरण को ठीक किया जा सकता : गौतम
गोमती आवाज ब्यूरो
लखनऊ। भारत को ऐसी खाद की जरूरत है, जो जमीन को ऊसर और बंजर न बनाएं। जीवाणुओं को जिंदा रखे और पृथ्वी के पी.एच. को तटस्थ रखे। देश को इस तरह की खाद बनाने पर जोर देना चाहिए। पहले के जमाने में किसान गोबर, राख, पुआल आदि का उपयोग कर धरती की उर्वरा शक्ति को बनाए रखते थे। उक्त विचार मनोज भाई सोलंकी ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में आयोजित पर्यावरण कुंभ के तीसरे सत्र में कृषि एवं पर्यावरण विषय पर व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी आजकल खेती को हेय दृष्टि से देख रही है। यह बहुत अच्छी स्थिति नहीं है। उन्होंने बताया कि प्रकृति ऐसा कोई पदार्थ नहीं है, जिसकी खाद न बन सके। कृषि विचारक गजानन डांगे ने कहा कि भारत में कृषि को फिर भारत की ओर ले जाने की जरूरत है। और इस निमित्त पाठ्यक्रम बनाए जाने चाहिए। यह पाठ्यक्रम कृषि वैज्ञानिकों के स्तर पर ही नहीं, किसानों के अनुभवों के आधार पर तैयार होना चाहिए। पाठ्यक्रम ऐसा हो, जिससे अपना परिसर, अपनी पहचान का बोध हो सके। उन्होंने कहा कि किसान को यह पता होना चाहिए कि वह किसी तरह के कृषि आर्थिक क्षेत्र में रह रहा है। उसकी भूमि किसी प्रकार की है और उसमें किसी तरह की फसल उगाई जा सकती है। उसे अपने क्षेत्र के वातावरण और पशु—पक्षियों के रहवास संबंधित जानकारी भी होनी चाहिए। भूमि का सपोषण बहुत बड़ी जरूरत है। भूमि को सुपोषित रखने की वजह से ही यह देश आज तक अपने कृषि निरन्तरता को बरकरार रखे हुए है। श्रीसूक्त के लक्ष्मीस्रोत के हवाले से भूमि के सपोषण का संकल्प व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि गोवंश के जरिये भूमि का सपोषण कर सकते हैं। भूमि के अनुसार फसल योजना बनाए। वह एक फसली, द्विफसली भी हो सकती है। ज्यादा फसल भी उपजाएं और भूमि का सुपोषण भी करें। भूमि के विश्राम का भी ध्यान रखें। भारत में अनेक ऐसे त्योहार हैं, जिनमें कृषि कार्य का निषेध है। कृषि तकनीकी और भूमि के निरोगीकरण पर ध्यान देकर किसान अच्छी फसल ले सकते हैं। बताया कि भारत में औसत जोत 1.5 हेक्टेयर भूमि की है। ऐसे में कृषि योजना भी भारत के अनुरुप बननी चाहिए। मनुष्य और कृषि चलित यंत्र चलाने की आवश्यकता है। किसानों को डिजिटली सपोर्ट सिस्टम खड़ा कर कृषि संबंधी आवश्यक जानकारी मुहैया करायी जा सकती है। जैव गतिविधियो के जरिये किसान मौसम का सटिक पूर्वानुमान कर सकता है। पवन की दिशा के अनुसार मौसम को जानने का इस देश में पुराना चलन है। अमलताश में जब भी पहला फूल आता है तब वर्षा होती है। पक्षियों के चहचहाने से भी लोग वर्षा को पुर्वानुमान लगा लेते थे। घाघ—भड्डरी, महादेव—सहदेव आदि की कहावतों को कृषि विज्ञान से जोड़कर देखने की जरूरत पर उन्होंने बल दिया। उन्होंने कहा कि कृषि पद्धति में पशुओं की नस्लों का बहुत बड़ा महत्व है, विडंबना इस बात की है हम भारतीयों ने एक प्रकार की गाय की नस्ल को बढ़ावा दिया। जबकि लोकसंचारित पद्धति से गायों की नस्ल को फिर से सुधारने की जरूरत है। जलागम क्षेत्र और उसमें जल का स्वभाव जानने की भी उन्होंने किसानों से अपील की। सत्र की अध्यक्षता करते हुए कल्लू सिंह गौतम ने कहा कि कृषक स्वयंसेवी संगठन, सरकार और कृषि विश्लेषकों को कुछ ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए, जिससे किसानों को कृषि क्षेत्र में हो रही नई गतिविधियों और शोध कार्यो की जानकारी हो सके। उन्होंने कहा कि हम ऑक्सीजन लेते हैं लेकिन कार्बनडाईऑक्साईड मुफ्त में मिलती है। तापमान बढ़ रहा है, एयर क्वॉलिटी इंडेक्स ज्यादा हो रहा है। कानपुर, दिल्ली में इंडेक्स 300 तक पहुंच चुका है। वायु की गुणवत्ता खराब हो रही है, ऐसे में सजग और संयमित रहने की जरूरत है। कहा कि अग्निहोत्र से पर्यावरण को ठीक किया जा सकता है।

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