मीटू के दौर में शब्दों की दुनिया

Opinion

मीटू सुनते ही डर और सिहरन का मिलाजुला भाव पैदा होता है ना! सभी को नहीं होता होगा, पर ज्यादातर को होता है, मुख्यत: पुरुषों को। लेकिन, यहां मीटू मुहिम के वैचारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आधारों पर नहीं, बल्कि इस शब्द और अन्य नए शब्दों के गठन पर बात होगी। दुनिया की कोई भी भाषा हो, उसमें नए शब्दों की आमद और पुराने शब्दों का मर जाना या नया रूप धर लेना एक निरंतर प्रक्रिया है। अंग्रेजी जानने वाले प्राय: सभी लोग मी टू को जानते हैं, चाहे वो रोमन की बजाय देवनागरी लिपि में ही क्यों न लिखा गया हो। पर, कुछ महीनों के भीतर ही इसका अर्थ बहुत गहरा, व्यापक और एकदम भिन्न हो गया है। पिछला अर्थ बौना बन गया। अब मीटू का अर्थ है, मैं भी पीडि़ता हूं। ये एक पूरी प्रक्रिया और पीड़ादायक कहानी को बयान करता है। ये जब तक अपनी स्वाभाविक परिणति तक नहीं पहुंचेगा, तब तक हमेशा इसी अर्थ को ध्वनित करता रहेगा। यह भी एक बड़ा संकेत है कि भारत में इन दिनों मीटू सोशल मीडिया पर सर्वाधिक प्रयोग किए जाने वाला शब्द है। हालांकि, यह संभव है कि अगले साल कोई नया शब्द तहलका मचा दे, जैसे कि पिछले साल अकादमिक दुनिया में लोशा ने लोगों का ध्यान खींचा था, हालांकि ये शब्द भारत पहुंचने से पहले ही दम तोड़ गया था। फिर भी लोशा अब डिक्शनरी और अकादमिक दुनिया का हिस्सा है। इसी तरह साल 2015 में ‘वो’ शब्द ने अपनी हैसियत का अहसास कराते हुए ‘वर्ड ऑफ द इयर’ का रुतबा पाया था। सोशल मीडिया की दुनिया में शब्द गठन की बात करें तो इसने अनेक ऐसे शब्द दिए हैं, जिन पर कोई एक भाषा दावा नहीं कर सकती। ये सर्वभाषा शब्द हैं। मसलन, फेसबुक, ट्विटर या ब्लॉग। रोचक बात यह कि यहां कई बार तो संज्ञाएं ही क्रियाओं में बदल रही हैं। फेसबुक मी, ट्विटर मी जैसे कई उदाहरण हमारे आसपास हैं। शब्दों के गठन की बात हो तो दुनिया के दिग्गज भाषाविद प्रोफेसर डेविड क्रिस्टल को सुनना चाहिए। वे ब्लॉग से ब्लॉगर ही नहीं बनाते, बल्कि ब्लॉगेरिया भी बना डालते हैं, जैसे ल्यूरोरिया या डायरिया। अब ब्लॉग करना तो ठीक है, लिखना भी ठीक है, लेकिन ये लत की हद तक चला जाए तो फिर ब्लॉगेरिया की जरूरत पड़ती ही है। वक्त का फेर ऐसा है कि नए शब्द पुराने शब्दों की सत्ता को चुनौती दे रहे हैं। अब हॉलीडे अतीत होता दिख रहा है, छुट्टियां मनानी हैं तो समरिंग और विंटरिग को चुन सकते हैं। गर्मियों की मौजमस्ती के लिए समरिंग और बर्फ के गोले बनाकर खेलने का आनंद विंटरिंग में मिलेगा। पिछले ओलंपिक और इसके बाद हुए एशियाड में मेडल के बाद मेडलिंग भी सुन ही चुके हैं। जो व्याकरण के भक्त हैं, उन्हें ये प्रक्रिया नागवार गुजरेगी, लेकिन भाषा तो ऐसे ही चलती और बदलती रहेगी। कौरवी और हरियाणवी का एक शब्द है-बक्कल। इसे तरबूज के छिलके के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है। अब शुद्धतावादी इसे ‘वल्कल बना दें तो बेचारा तरबूज भी नहीं समझ पाएगा क्योंकि वो खुद भारत में अरब से आया प्रवासी शब्द है। उसके लिए बक्कल ही ठीक रहेगा! पिछले साल जब आक्सफोर्ड डिक्शनरी का नया संस्करण सामने आया तो गर्व के साथ इस बात की घोषणा की गई कि दक्षिण भारतीय भाषाओं के 1400 शब्दों को अंग्रेजी में स्वीकार कर लिया गया है। वैसे भी धर्म, कर्म, योग, भक्ति, पंडित, यज्ञ, स्वाहा जैसे धार्मिक शब्दों और परांठा, हलवा, समोसा, जलेबी आदि के लिए क्या शब्द ढूंढ़ा जाएगा! इनका आनंद ज्यों का त्यों स्वीकार करने में ही है। वैसे ही, जैसे सैंडविंच, क्रीमरोल, बर्गर को मूल शब्द ध्वनियों के साथ खाने से ही आनंद की अनुभूति होगी। करने को तो कुछ उत्साही लोग, ‘पिन ड्राप साइंलेंस का अनुवाद ‘सुई टपक सन्नाटा कर देते हैं। पर, इनसे केवल हास्य ही पैदा होता, वास्तविक अर्थ ध्वनित नहीं होता। ऐसा ही हास्य तब भी पैदा होता है, जब कोई पोस्ट बॉक्स के लिए ‘पत्र-मंजूषा शब्द का इस्तेेमाल करने लगता है। बिहार का पिछले साल का वो किस्सा भी याद किए जाने लायक है, जब सरकार ने डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट का हिंदी अनुवाद जनपद दंडाधिकारी करा दिया। जब डाकिया डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट की डाक लेकर पहुंचा तो उसने डाक डिलीवर करने की बजाय अपने विभाग को लिखा कि उक्त अधिकारी अब संबंधित पते पर मौजूद नहीं है। बाद में पोस्ट मास्टर जनरल के दखल के पश्चात हिंदी और अंगेेजी, दोनों नाम एक साथ लिखे गए। खैर, अब जनपद दंडाधिकारी ने जिलाधिकारी के रूप में जन्म ले लिया है। वस्तुत: शब्द की अर्थपूर्ण संप्रेषणीयता के लिए उसकी लोक स्वीकार्यता ही मूल आधार है। जैसे कि मीटू के संदर्भ में लोक स्वीकार्यता हुई। भाषा का मूल काम है-अर्थ को संप्रेषित करना, विचार को अभिव्यक्ति देना। लंबा वक्त गुजरने के बाद शुद्धतावादियों को भी यह याद नहीं रहता कि जब वे, ‘काजू खाते हुए चिडिय़ा को देखते हैं’ तो फ्रेंच का काजू और डच भाषा का चिडिय़ा भी उनकी जिंदगी का हिस्सा बन जाता है। यदि, न्यायालय की बात करें तो ‘जब अदालत में कुर्सी पर बैठा जज, वकील से सवाल पूछता है और लिफाफा खोलकर बहस के मजमून को कानून की निगाह से देखकर इंसाफ करता है, तब सच्चे इंसाफ के लिए दुनिया उसकी हिम्मत की दाद देती है और गरीब आदमी अदब से झुक जाता है। इस वाक्य में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो समझ में न आ रहा हो, लेकिन एक छिपी हुई बात ये है कि वाक्य के भीतर के योजक-शब्दों को छोड़ दें तो इसमें हिंदी को कुछ भी नहीं है। सारे शब्द अरबी-फारसी के हैं। यानि व्याकरणाचार्यों का डर न हो तो भाषाओं का दिल बड़ा होता है, जो जहां से भी आता है, उसमें समाता जाता है। अब वैद्य और चिकित्सक बोलने में जीभ को कष्ट होता है, लेकिन डॉक्टर उसे अपना लगने लगता है। नर्स की तुलना में परिचारिका तो और भी कठिन मामला हो जाता है। किसी खास वक्त का स्लैंग या अभद्र शब्द मानक भाषा में स्वीकार करने की सुदीर्घ परंपरा मौजूद है, स्वीकार न किया जाए तो उसकी वर्तनी बदलकर मूल अर्थ को बनाए रखा जाता है। सभ्य लोगों के लिए एक अभद्र और अश्लील समझे जाने वाले शब्द को ‘ सुतियापा लिख दीजिए, अर्थ ज्यों का त्यों ध्वनित होता है। ये शब्द भी नए मीडिया की ही उपज है। ऐसे ही ‘सूतियानंदन आ जाता है, क्योंकि ‘वैशाखनंदन अब पुराना शब्द हो गया है। शब्दों की घिसावट के दौर में ‘वज्रपटु अपना अर्थ खोकर ‘बजरबट्टू बना तो ‘डेमोक्रेसी अपने साथ ‘मोबोक्रेसी भी ले आया। जब समूह अपना चरित्र खो दे तो उसे डेमोक्रेे सी के साथ मोबोक्रे सी की जरूरत भी पड़ेगी ही। आम पाठक नए-पुराने तमाम शब्दों से परिचित है, पर कम ही लोगों को पता होगा कि शब्दों की काया भी बदलती है। पुराने से नए शरीर में आ जाते हैं। जब भारतीय-जिह्वा को सेक्रेटरिएट बोलने में मुश्किल आई तो इसे सचिवालय के रूप में स्वीकार किया गया। ऐसे ही टेक्नीकल सहजता से तकनीकी हो गया। शब्दों की इस आवाजाही या आवतजावत में उन्हें भी याद कर लें, जो अब फैशन में नहीं हैं। मसलन, ‘अरब-स्प्रिंग अब भूत हो गया। नए दौर में शब्दों की बात ‘जी के बिना पूरी नहीं होती। 2जी, 3जी से लेकर 4जी और अब तो 5जी की बात भी शुरू हो गई। तब तक, मीटू के असर का आकलन किया जाए वो असर चाहे भाषा विज्ञान पर हो या फिर मानव -जीवन के किसी भी संबंध पर। साथ ही, उम्मीद की जाए कि आईटू भी सामने आएगा ताकि पुरुषों को खुद अपने गुनाह स्वीकारने का मौका मिले और चर्च गए बिना भी ‘कनफैस कर पाएं!

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