भारतीय धरोहरों के लिए यूएन चिंतित

Opinion

किसी भी देश की संस्कृति से उसके इतिहास का पता चलता है। आसपास के देशों में ही नहीं, पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति के प्राचीन होने के प्रमाण मिलते हैं। कालांतर में भारत की अनेक धरोहरों के गुम होने जाने से संयुक्त राष्ट्र ने चिंता जाहिर की हैं। यूएन ने कहा है कि वह विभिन्न कलाओं,शिल्पकारों व अन्य विरासतों की एक सूची तैयार करने की योजना प्रारंभ करेगा। हिन्दुस्तान में यूनएन के रेजिडेंट कोऑरिर्डिनेटर युरी अफानासीव ने कहा कि ‘विकी शैली की परियोजना’ तैयार की गई है जिसमें अलग-अलग पक्षों में शुमार कर ‘क्राउड सोर्सिंग’ से इसे पूर्ण किया जाएगा। साथ मे यह भी कहा कि भारत में न केवल ऐतिहासिक स्मारक व स्थल और निर्मित धरोहर बल्कि, यहां लोक संगीत,हस्तकला,कपड़ा डिजायन,कलाएं व प्राचीन धातुओं जैसी बेशकीमती व अमूर्त सांस्कृतिक विरासत हैं। संयुक्त राष्ट्र स्थापना दिवस पर अफानासीव ने यह कहते हुए भी भारत की सांस्कृतिक विरासत की प्रशंसा की ”मुझे भारत से उसके समृद्ध स्वाद,रंग, ध्वनियां, गंध और व्यंजन आदि को लेकर प्यार है।’ अमूर्त सांस्कृतिक धरोहरों के निरंतर गायब होना एक चिंता का विषय है। यदि भविष्य व वर्तमान में इतिहास की चर्चा नहीं होगी तो आने वाली पीढ़ी को देश की संस्कृति के बारें में कैसे बताएगें। यूनेस्को की मानवता अमूर्त सांस्कृतिक विरासतों की प्रतिनिधि लिस्ट मे 13 अस्पृश्य धरोहरों को शामिल किया जा चुका है। इनमें कुंभ मेला,रामलीला,संस्कृत नाटक,नवरोज,वैदिक मंत्रोच्चार, कुटियाट्टम, कालबेलिया(राजस्थानी लोकगायन व नृत्य),रम्माण(गढ़वाली धार्मिक त्यौहार) के साथ छऊ नृत्य आदि शामिल है। भारत जैसे देश मे कई देशों के बराबर जनसंख्या विद्यमान है। अर्थात् यहां एक देश में ही अनेकों देश बसे हुए हैं। हिन्दुस्तान में हर लगभग अस्सी से सौ किलोमीटर बाद भाषा व संस्कृति बदल जाती है। विश्व की सबसे प्रमाणित एजेंसियों में से एक अमेरिकी खोज एजेंसी तक ने यह बात प्रमाणित कर दी कि द्वापर युग व त्रेता युग में यहां लोग रहा करते थे। रामायण में जो बातें लिखी गईं, उसके सबूत भी मिले हैं। यह बात हमारे लिए सौभाग्य की भी है व आश्चर्य करने की भी। यूनेस्कों ने भारत के कुंभ को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रुप में मान्यता दी थी तो प्रधानमंत्री मोदी व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने खुशी जाहिर की थी। इस घटना पर प्रधानमंत्री अपने ट्वीट में कहा था, बता दें कि यूनेस्को ने भारत के कुंभ मेले को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दी है जो इस आध्यात्मिक महोत्सव की बड़ी स्वीकार्यता है। कुंभ मेले को दुनिया का सबसे बड़ा महोत्सव माना जाता है, जहां लाखों लोग पवित्र नदियों के किनारे स्नान के लिए दुनिया भर से जमा होते हैं। इस घटना के लिए सौभाग्य इसलिए कहा कि हमें कुंभ मेले की वजह से विश्व स्तरीय पहचान मिली व हमारी इस ऐतिहासिक धरोहर की चर्चा पूरे विश्व में होने लगी। आश्चर्य शब्द का प्रयोग इसलिए क्योंकि हमारी इन धरोहरों की गंभीरता हमसे ज्यादा विदेशों में समझी जाती है। यह सिर्फ एक मामले का जिक्र है। हमारे देश में ऐसे अनेकों धरोहरें हैं। दरअसल, देश में हर जगह इतना शहरीकरण होता जा रहा है कि हम पुरानी संस्कृति को बड़े स्तर पर नजरअंदाज करते जा रहे हैं। हमारी जरूरतों ने हमें इस कदर घेर लिया जिससे हम आज यह समझने में पूर्णत असक्षम होते जा रहे हैं कि जिससे हमारे बुजुर्गों की विरासत की कीमत का हमें अंदाजा ही नहीं हो पा रहा। हमें प्रकृति व कलाकारों,शिल्पकारों व कलात्मक कृति के सौदागरों ने इतना खजाना दिया है कि हम गंभीरता समझ जाएं तो हमे गर्व होगा। प्रकृति को इसलिए जोड़ा क्योंकि भारत व उसके आसपास के देशों में ही हर मौसम देखने को मिलता है वरना विश्व के अन्य देशों में इतनी असमानता है कि कुछ देश केवल गर्मी रहती है तो कुछ में सर्दी। इसके अलावा जितनी भाषाएं हमारे देश में बोली जाती हैं, उतनी कहीं नही बोली जाती व जितने व्यजंन के प्रकार हमारे यहां हैं, उतने किसी अन्य देश में देखने को नहीं मिलेगें। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि 195 देशों की संस्था यूनेस्को हमारे देश के इतिहास व कलाओं को खोजकर हमें गर्वित महसूस करवा रही है। हमारे देश के हर राज्य में अलग अलग सैंकड़ों संस्कृतियां शुमार हैं। कुछ संस्कृतियां तो आधुनिकीकरण के चक्कर मे लुप्त हो गई हैं जिस पर यूएन ने चिंता जाहिर करते हुए इनको बचाने की कयावद छेड़ी है। इसके अलावा हमें भी अपने रिति-रिवाज व परंपराओं को जिंदा रखते हुए उनको बरकरार रखना चाहिए। आगरा का लालकिला,अजंता की गुफाएं,एलोरा की गुफाएं,ताजमहल,कोर्णाक मंदिर,सांची के बौद्ध स्तूप,चंपानेर पावागढ़ का पुरातत्व पार्क,चितौडग़ढ़ का किला आदि कई ऐतिहासिक धरोहरों को यूनेस्को ने विश्व विरासत घोषित कर रखा है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जितनी ऐतिहासिक धरोहरों की लंबी फेहरिस्त हमारे देश में हैं ,उतनी पूरे विश्व मे कहीं नहीं। धार्मिक स्तर की प्रमाणिकता यहां भगवान के होने तक को तय करती हैं। ज्ञात हो कि आजादी से पहले भारत को सोने की चिडिया कहा जाता था क्योंकि यहां इतना खजाना था कि पूरे विश्व में कहीं नहीं था। इसके अलावा यहां कि भूमि इतनी उपजाऊ है कि हर तरह खाद साम्रगी उग जाती थी व आज भी उगती है। हर धर्म, जाति व उनकी संस्कृति का सबसे सजीव देश है हिन्दुस्तान, जिसकी वजह से हमें सम्मानित व प्रगतिशील देशों मे गिना जाता रहा है।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *