भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार है हमारी उत्सवी -संस्कृति

Opinion

 

अपने धार्मिक पर्वों को ऋषि-महर्षियों ने किस तरह लोकजीवन से जोड़ा है- इसे स्मरण करते ही हमें अपने पूज्यों के प्रति नत व उनके प्रयासों के प्रति वरबस ही विस्मित रह जाना पड़ता है। अपने उत्सवों को ही देखें- एक ओर हमारी उत्सव संस्कृति हमारे प्राणिमात्र को आनन्द की अनुभूति कराती है, वहीं ऋषि प्रणीत नियमों का पालन हमारे स्वास्थ्य की चिन्ता भी करता चलता है। यह उत्सव एक अन्य प्रमुख कार्य भी अनायास करते हैं। वह है- अपने उत्पादों के लिए बाजार बनाना। ऋषिगण के इन प्रयासों का परिणाम जहां श्रमिक को अपने श्रम के प्रतिफल के रूप में मिलता है, वहीं यह सम्पूर्ण कारबार हमारे व्यापार-चक्र को गति दे जाता है। उदाहरण के लिए किसी देवपूजन के लिए आवश्यक पूजन सामग्री का अवलोकन करें। किसी पंथ विशेष की विशिष्ट आराधना के लिए आवश्यक अतिरिक्त सामग्री को छोड़ भी दें तो हमें देवपूजन के लिए सामान्यत:- रोली, चावल, कलावा, विभिन्न प्रकार की दालें, पान, सुपारी, नारियल, लौंग, इलाइची, जायफल, वस्त्र, पंचमेवा, धूप, दीप, गंध, हवन सामग्री, घृत आदि की आवश्यकता रहती है। अब जरा उत्तरप्रदेश के परिप्रेक्ष्य को दृष्टिगत रख विचारें। ये सुपारी, नारियल, लौंग, इलाइची, जायफल आदि क्या बिना दक्षिण भारत से व्यापार किये। उपलब्ध होना संभव है? क्या कश्मीर व अफगानिस्तान का सहयोग लिए बिना पंचमेवा की आपूर्ति की जा सकती है? पान के लिए जहां बुंदेलखंड के महोबा से लेकर कोलकाता, श्रीलंका तक भ्रमण करना होगा, तो वहां के लोगों को भी कपास निर्मित कलावा, धूप, घृत आदि के लिए आपसे सम्बन्ध रखना ही होगा। अन्यथा देवपूजन ही सफल नहीं होगा। क्या ऋषिगण का यह प्रयास भारत के अफगानिस्तान के हिन्दूकुश से समुद्रपर्यन्त तक के भौगोलिक क्षेत्र के आंतरिक व्यापार को स्थापित नहीं करता? प्रश्न का उत्तर आर्यो को बाहरी बतानेवाले तथा भारत की खण्ड-खण्ड करने की प्रवृत्ति रखनेवालों के लिए भले ही असहज करनेवाला हो, हमारे आपके लिए तो प्राचीन भारत की उस एकता का परिचायक है जो सहज गर्व का विषय है। ऋषिवर्य इन त्योहारों, इन उत्सवों के माध्यम से मात्र व्यापार का ही ध्यान नहीं रखते, उन्हें आपके स्वास्थ्य की भी पूरी चिंता है। यही कारण है कि हमारे त्योहार पकवानों से लेकर फलों व अन्य सामग्री तक पूर्णत: उस मौसम विशेष- जिसमें त्योहार मनाया जा रहा है- का अनुकरण तो करते ही है, इनके माध्यम से अपने प्रत्येक अनुयायी को अनायास ही पौष्टिक व स्वास्थ्यवर्धक द्रव्यों के सेवन की प्रेरणा देते हैं। रही बात उन्हें पचाने की, तो इसके लिए देवपूजा से पूर्व व्रत का विधान भी तो है। दृष्टि दौड़ाएं तो पाएंगे कि इन त्योहारों व उत्सवों के माध्यम से ही हमारे ऋषि उन लघु व कुटीर श्रेणी उत्पादकों की भी चिंता कर लेते हैं, जो अपने श्रम से स्थानीय स्तर का उत्पादन करते हैं। दीपक, पुरूवा, करवा बनाने वाले, खील-बताशा के निर्माता, होली के रंग बनानेवाले ही नहीं, सिरकी और सूप बनानेवाले कर्मकार के लिए भी वर्ष में न्यूनतम एक दिन तो निश्चित ही है, जब उन्हें भी अपना ‘स्टाक निल करने का अवसर मिले। क्या त्योहारों व उत्सवों के साथ चलनेवाली ये आर्थिक गतिविधि ही अर्थव्यवस्था को गतिशील नहीं बनातीं। अगर विश्वास न आये तो अपने किसी मार्केटिंग के मित्र से पूछें कि 2019 में प्रयागराज में लग रहे ‘कुंभ’ पर्व का इवेंट करोड़ों का होगा या अरबों का। साथ ही देखें कि समाचार पत्र व चैनलों पर त्योहार के समय होनेवाली विज्ञापनों की बरसात कैसे होती है। आप भले ही न समझें, बाजार की समझ रखनेवाला प्रत्येक इन अवसरों के लाभ उठाने को तत्पर है। और अंत में कभी आपने माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र में स्वयं माता द्वारा दिये गये संकेत को समझा है? माता की चतुर्भुजी प्रतिमा की तीन भुजाएं सहेजने का कार्य करती हैं, जबकि एक भुजा उस सहेजे को मुक्तहस्त लुटाने/दान करने के अर्थ का प्रसारण करने का। देवी मां से वर मांगते समय हम उस भुजा का अर्थ वर लेने के अर्थ में तो करते हैं, स्वयं देने के अर्थ में नहीं। जबकि व्यापार ‘लेन’ के साथ ‘देन’ क्रिया से ही गतिशील होता है।

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