जीतेगा वही जो काम करेगा

Opinion

सुबह-सुबह एक मित्र का फोन आया, यह पूछने के लिए कि पांच राज्यों के नजदीकी चुनाव में जीतेगा कौन? सवाल यहीं तक सीमित होता तो भी गनीमत थी। उस सवाल में क्यों वाली उत्सुकता भी थी। खुद को जस्टिफाई तो मैं कभी कर ही नही पाया। इस सवाल पर क्या करता। इसलिए कह दिया कि जो काम करेगा, जीतेगा लेकिन भारत में काम करने वाली पार्टियां भी हारती रही हैं। चुनावी हार जीत का कोई एक कारण तो होता नहीं। आजकल देश में झूठ बोलकर जीतने की होड़ लगी है। इस चक्कर में नेताओं पर मानहानि के मुकदमे तक दर्ज हो जा रहे हैं। राहुल गांधी कह रहे हैं कि जीभ फिसल गई लेकिन इस यू टर्न से बात तो बनती नहीं। शिवराज मामा ने उन पर मान हानि का केस कर दिया। पिता की आलोचना करते-करते बेटे तक पहुंच गए। बेटे का पूरा कैरियर पड़ा है। आपने तो जुबान हिला दी, लेकिन छवि तो उसकी खराब हुई। ज्यादा बोलने की मनाही नीति शास्त्र भी करते है। अति का भल न बोलना, अति का भला न चुप। अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप। चुनाव के दौरान झूठ की इंतिहा हो जाती है। सभी एक दूसरे पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हैं। नेता ही कंफ्यूज नहीं होता, जनता भी कंफ्यूज होती है। इसका असर लोकतंत्र को कमजोर बनाता है। पांच राज्यों के चुनाव को 2019 के लोक सभा चुनाव के सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भाजपा को राजनीतिक संबल देने को जैसे कमर ही कस ली है। इलाहाबाद को प्रयागराज नाम देकर और वहां कुंभ मेले की तैयारियों को चाक चौबंद करके वे पांच राज्यों ही नहीं, देश भर में भाजपा की जय-जय कराने के पक्षधर हैं। कुम्भ में 5500 भगवा बसों का संचालन तो इसी ओर संकेत करता है। कुछ बसें प्रयागराज पहुंच भी गयी हैं। हर सप्ताह होने वाली कैबिनेट की बैठक में उनकी सरकार निरंतर अहम निर्णय ले रही है। इसका परोक्ष असर तो पांच राज्यों के चुनाव पर पड़ेगा ही, यह बात कही जा सकती है। योगी सरकार ने आवासीय योजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण करने के लिए लैंड पूलिंग लागू करने की योजना बनाई है। इसके लिए उसका जोर सर्वप्रथम कानून बनाने पर है। इस एक्ट के बन जाने के बाद विकास प्राधिकरण, आवास विकास परिषद व अन्य संस्थाएं इस योजना के तहत भूमि की व्यवस्था आसानी से कर सकेंगी। योगी ने एक्ट बनने के बाद पहले चरण में 25 एकड़ से अधिक जमीन लेकर लखनऊ सहित बड़े शहरों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने के भी आदेश दिए हैं। साथ ही इस योजना के तहत किसानों की सहमति से ही भूमि अधिग्रहण करने को कहा है। इसका लाभ जाहिर तौर पर किसानों को होगा। भांग की खेती को मंजूरी भी एक बड़ा फैसला है। इसमें शक नही कि सियासत की चौपड़ सज चुकी है। सत्ता के सेमीफाइनल के लिए फील्ड सजने लगा है। पांच राज्यों के चुनावी नतीजे यह संकेत देंगे कि 2019 के लोकसभा चुनावों को लेकर देश की जनता क्या सोचती है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़,मिजोरम व तेलंगाना विधानसभा चुनावों के नतीजे 11 दिसम्बर को आएंगे और इन नतीजों पर राजनीतिक पर्यवेक्षकों के साथ-साथ पूरे देश की निगाहें टिकी हैं। इस समय राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकारें हैं। तेलंगाना में टी.आर.एस. और मिजोरम में कांग्रेस की सरकार है। देश को कांग्रेस मुक्त करना है तो भाजपा को मिजोरम में कांग्रेस से सत्ता छीनना होगा। यही नही,भाजपा शासित तीनों राज्यों में अपनी सल्तनत भी बचानी होगी। इन पांचों राज्यों में कुल मिलाकर 83 लोकसभा सीटें हैं जिनमें से 60 सीटें फिलहाल भाजपा के पास हैं। ऐसे में पांचों राज्यों के ये चुनाव मोदी सरकार के लिए लिटमस टेस्ट जैसे ही हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस जीत हासिल करती है तो अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए जहां कांग्रेस को संजीवनी मिलेगी, वहीं मोदी सरकार की उलटी गिनती भी शुरू हो जाएगी। लेकिन अगर भाजपा इन राज्यों में अपनी सत्ता बचाने में कामयाब हो जाती है तो 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए वह फिर से नई ऊर्जा हासिल कर लेगी। पिछले एक साल के दौरान देश में हुए उपचुनाव के निराशाजनक नतीजों को देखते हुए भाजपा ने इन सभी राज्यों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। मध्य प्रदेश में 231 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 230 सीटों पर ही चुनाव होने हैं । वहां एक सदस्य को नामित किया जाता है। इस समय राज्य में भाजपा के पास 166, कांग्रेस के पास 57, बसपा के पास 4 और अन्य के पास 3 सीटें हैं। मध्य प्रदेश में मुकाबला इस बार भी कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है। राजस्थान में विधानसभा की कुल 200 सीटें हैं। इनमें से इस समय भाजपा के पास 163, कांग्रेस के पास 21, बसपा के पास 4, एन.पी.पी. के पास 4, निर्दलीय के पास 7 और एन.यू.जेड पी. के पास 2 सीटें हैं। यहां भी मुकाबला मुख्य रूप से कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है। छत्तीसगढ़ में कुल 90 विधानसभा सीटें हैं। वर्ष 2013 में हुए विधानसभा चुनावों में छत्तीसगढ़ में भाजपा को 49, कांग्रेस को 39, बसपा को एक और अन्य को भी एक ही सीट मिली थी। यहा भी मुख्य संघर्ष कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है। पूर्वोत्तर के मिजोरम में कुल 40 विधानसभा सीटें हैं जिनमें से इस समय कांग्रेस के पास 34, एम.एन.एफ. के पास 5 और एम.पी.सी. के पास एक सीट है। भाजपा को अभी तक इस राज्य में अपना खाता खुलने का इंतजार है। रही बात तेलंगाना की तो यहां कुल 119 विधानसभा सीटें हैं। मिजोरम और तेलंगाना में भाजपा को अपने अस्तित्व की जंग लडऩी है, जबकि मध्य प्रदेश,राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उसे अपना किला बचाना है। तेलंगाना विस चुनाव में यहां टी.आर.एस. ने 90 सीटें जीती थीं सत्ता से जनता की नाराजगी भी होती है। सरकारें चाहकर भी सभी को खुश नहीं कर सकतीं। भाजपा अपने विकास कार्यों के बल पर जहां फिर सत्ता में वापसी के दावे कर रही है, वही कांग्रेस को अपने बड़े नेताओं के चमत्कार का इंतजार है। कांग्रेस को लगता है कि जनता इस बार भाजपा को बदलना जरूर चाहेगी। इसके विपरीत राहुल गांधी जिस तरह से मिथ्या संभाषण कर रहे हैं,उससे कांग्रेस को लाभ काम, नुकसान ज्यादा होने के आसार हैं। राम जन्मभूमि मामले में अगर सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई शुरू कर दी होती, तब भी भाजपा को राजनीतिक लाभ मिल सकता था। प्रयागराज का कुम्भ आयोजन बोनस का काम करता। कल्पवासियों को 17 रुपये किलो चीनी देने और 5500 भगवा बसें चलाने का योगी का निर्णय, प्राकृतिक गैस पर वैट घटाकर, जापान के साथ कृषि क्षेत्र में निवेश को हरी झंडी देकर योगी ने अकेले यूपी का ही दिल नहीं जीता, बल्कि देश के अन्य राज्यों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है। इसका परोक्ष लाभ भाजपा को पांच राज्यों में मिल सकता है। योगी भाजपा के स्टार प्रचारक भी हैं,इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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