अमेठी का मां अहोरवा भवानी का प्राचीन मंदिर

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दिन भर में तीन रूप में परिवर्तित होती है मूर्ति
गोमती आवाज ब्यूरो
लखनऊ। अमेठी की जमीन पर धार्मिक अनुष्ठान के बहुतेरे केंद्र हैं। इन्हीं में एक नाम मां अहोरवा भवानी का प्राचीन मंदिर है, जिसे अहोरवा भवानी के नाम से जाना जाता है। नवरात्रि में यहां भक्तों की अपार भीड़ जुटती है। जिला मुख्यालय से 65 किलोमीटर दूर रायबरेली से इन्हौना मार्ग पर सिंहपुर ब्लॉक में ये मंदिर स्थापित है। मान्यता है कि यहां दर्शन मात्र से ही असाध्य से असाध्य रोग दूर हो जाते हैं और भक्तों द्वारा मांगी गई मुराद पूरी हो जाती है। मंदिर में मां की मूर्ति पुरानी व प्राकृतिक है। यही नहीं यहां मां दिन भर में तीन रूप में परिवर्तित होती है। सुबह बाल रूप, दोपहर में युवावस्था वह शाम में वृद्ध रूप में नजर आती हैं। सुनने में ये बात भले ही अद्भुुत लगती हो लेकिन मां के दिव्य दर्शन करने वाले इसे महसूस भी करते हैं। कहा जाता है कि मंदिर में रखी मां की प्रतिमा स्वयंभू है। मान्यताओं के अनुसार पांडव जब वनवास के दौरान अज्ञातवास का समय बिता रहे थे, तो इसी क्षेत्र में काफी समय तक रहना पड़ा था। एक दिन जंगल में अर्जुन शिकार के लिए निकले तो वहां उनको जंगलों के बीचों-बीच दिव्य स्वरूप माता के दर्शन प्राप्त हुए। वहां से वापस लौट कर अर्जुन ने उस मंदिर और उसमें विराज हुई माता के विषय में अपने चारों भाइयों को जानकारी दी। इस पर सभी ने उनका दर्शन कर पूजा अर्चना की। महाभारत में इस मंदिर और माता का उल्लेख स्पष्ट शब्दों में लिखा गया है। कहा जाता है कि माता के लिए इस भव्य मंदिर का निर्माण स्वयं पांडवों ने मिलकर किया था, लेकिन समय के साथ मंदिर में मां की प्रतिमा विलुप्त हो गई फिर कालांतर में एक स्थानीय व्यक्ति अहोरवा नामक पाल बिरादरी के व्यक्ति ने सपने में मां की मूर्ति को देखा। उसके बाद सपने के आधार पर मां की खोज की, जिसके बाद मूर्ति मिली। इसके बाद से ही इस मंदिर को अहोरवा भवानी के नाम से जाना जाने लगा। इस मंदिर को लेकर कई अन्य तरह की पौराणिक कहानियां हैं। वहीं इसकी बेहद मान्यता होने के कारण दूर-दराज से भी श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं।

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