उत्तर भारतीयों का भी है भारत

Opinion

गुजरात में पिछली 28 सितंबर को अहमदाबाद से 100 किलोमीट दूर बनासकांठा के हिम्मतनगर शहर के पास एक दुधमुही बच्ची के साथ बलात्कार की घटना के बाद वहां के बहुत से शहरों में बिहारी और उत्तर प्रदेश के मजदूरों के साथ योजनाबद्ध तरीके से मारपीट होती रही। मारपीट से डरे-सहमे लोग अब अपनी जान बचाने के लिए अपने घरों को लौट रहे हैं। मैं यह लेख गुजरात से ही लिख रहा हूँ । अबतक पचास हजार से ज्यादा उत्तर भारतीय श्रमिक वापस लौट गए हैं । एक सप्ताह के अन्दर सैकड़ों सुनियोजित हमले हुए हैं, जिसमें बिहार-यूपी के हजारों श्रमिकों को लात-घूंसे और डंडों से पीटा गया है। यह पलायन बेहद चिंताजनक है। कहा जा रहा है कि कथित बलात्कारी बिहारी मूल का है। इसलिए वहां के स्थानीय लोग उत्तर प्रदेश-बिहार समेत सभी उत्तर भारतीय लोगों पर टूट पड़े। क्या ये लोग उस कथित बलात्कारी का समर्थन कर रहे थे? अगर किसी व्यक्ति ने बलात्कार जैसा जघन्य कृत्य किया है तो उसे कानून के मुताबिक दंड मिलना ही चाहिए। दूसरी ओर, किसी को भी कानून अपने हाथों में लेने का अधिकार नहीं है। अपने घरों से हजारों मील दूर इन उत्तर भारतीय लोगों पर मेहसाणा, गांधीनगर, साबरकांठा, पाटन, सानंद और अहमदाबाद जिलों में हमले हुए। गुजरात में उत्तर प्रदेश-बिहार से लाखों लोग काम करने गए हुए हैं। उनमें से किसी एक इंसान के राक्षसी कृत्य के कारण सबको सजा देना कहां से वाजिब माना जाए? बेशक जो बलात्कार के उपर्युक्त मामले को किसी क्षेत्र विशेष के लोगों से जोड़कर देख रहे हैं, वे अपनी संकीर्ण मानसिकता का ही परिचय दे रहे हैं। ये देश ‘हम और ‘तुम के हिसाब से नहीं चलेगा। अगर इस तरह से कोई चलाने की मंशा रखता है, तो उसे ये देश स्वीकार करने वाला नहीं है। दरअसल बहुत लंबे समय से उत्तर प्रदेश और बिहार के मूल निवासियों पर देश के अलग-अलग भागों में हमले हो रहे हैं। असम के तिनसुकिया इलाके में सन 2015 में संदिग्ध उल्फा आतंकवादियों के हाथों एक हिंदी-भाषी व्यापारी और उसकी बेटी की हत्या कर दी गई थी। असम में वो कोई पहली घटना नहीं थी जब हिन्दी भाषियों पर हमला हुआ था। दरअसल, जब भी उल्फा को केंद्र के सामने अपनी ताकत दिखानी होती है, वह निर्दोष हिन्दी भाषियों (उत्तर प्रदेश-बिहार वाले) को ही निशाना बनाने लगता है। विगत दशकों से पूर्वोत्तर के दो राज्यों क्रमश: असम तथा मणिपुर में हिन्दी भाषियों को मारा जा रहा है। ये हिन्दी भाषी पूर्वोत्तर में सदियों से बसे हुए हैं। उन क्षेत्रों के विकास में लगे हुए हैं। उन्हें मारा जाना देश के संघीय ढांचे को ललकराने के समान है। यह स्थिति हर हालत में रूकनी ही चाहिए। इसे ना रोका गया तो देश बिखराव की तरफ बढ़ेगा। असम तथा मणिपुर में हिन्दी भाषियों की आबादी काफी है। ये अब असमिया तथा मणिपुरी ही बोलते हैं। वे पूरी तरह से वहां के ही हो गए हैं। बस एक तरह से इनके अपने पुरख़ों के राज्यों से भावनात्मक संबंध ही बचे हैं। लेकिन, गुजरात में अभी जो दंगे हो रहे हैं उसमें तो असमिया, मणिपुर, उड़ीसा और बंगाली भी पिट रहे हैं। दिल्ली में भी अपने मुख्यमंत्रित्वकाल के दौरान शीला दीक्षित ने एक बार राजधानी की समस्याओं के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार से आकर बसनेवाले लोगों को जि़म्मेदार ठहरा दिया था। यह बात 2007 की हैं, जब शीला दीक्षित ने कहा था कि दिल्ली एक संपन्न राज्य है और यहाँ जीवनयापन के लिए बाहर से और विशेषकर उत्तर प्रदेश तथा बिहार से बड़ी संख्या में लोग आते हैं और यहीं बस जाते हैं। इस कारण से यहां की मूलभूत सुविधाओं को उपलब्ध कराना कठिन हो गया था। हालांकि वो ये बयान देते वक्त भूल गईं थीं कि उनका खुद का परिवार भी उत्तर प्रदेश से ही दिल्ली में आकर बसा था। हालांकि, तब जब उनके बयान की चौतरफा निंदा हुई तो वो कहने लगीं कि उनकी बातों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। महाराष्ट्र में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता और उनके सड़कछाप कार्यकर्ता उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के साथ मारने-पीटने से बाज नहीं आते। वे इन प्रदेशों के नागरिकों को ‘बाहरी कहते हैं। तथ्य है कि सिर्फ समावेशी समाज ही आगे बढ़ते हैं। आपके सामने है अमेरिका का उदाहरण। सारा संसार अमेरिका को अपना आदर्श मानता है। उसकी ये स्थिति इसलिए बनी क्योंकि वहां पर सबके लिए आगे बढऩे के समान अवसर हैं। वहां पर दुनिया के कोने-कोने से लोग आकर बसते हैं। उधर जाते ही सब अमेरिकी हो जाते हैं। एक बात मान कर चलिए कि यदि देश को कानून के रास्ते से नहीं चलाया गया तो फिर अराजकता वाली स्थिति पैदा हो जाएगी। ये देश सबका है, यहां के संसाधन हर भारतीय के हैं। इसलिए किसी के साथ कहीं भी उसकी जाति, धर्म, रंग आदि के आधार पर भेदभाव किया जाना असहनीय है। जो हिन्दी भाषियों के साथ हो रहा है, इस मानसिकता पर तुरंत रोक लगाने की आवश्यकता है। ये उसी तरह से निंदनीय है,जिस तरह से दिल्ली या देश के कुछ भागों में पूर्वोत्तर राज्यों के नागरिकों के साथ भेदभाव होता है। गुजरात में जो कुछ घटित हो रहा है, वो उत्तर प्रदेश और बिहार के कर्णधारों के लिए एक तरह से संदेश भी है । इन्हें अब अपने यहां भी रोजगार के पर्याप्त अवसर सर्जित करने होंगे। दुर्भाग्यवश इन दोनों राज्यों में फिलहाल राजनीतिक उद्योग के अलावा कोई उद्योग फल-फूल नहीं रहा है। पर इससे पेट की आग नहीं बुझती। अब भी ये दोनों सूबे विकास की दौड़ से बहुत दूर हैं। यहां के नागरिक भी विकास की ख्वाहिश रखते हैं। वे भी बाकी हिन्दुस्तानियों की भांति बेहतर जिंदगी जीने का सपना देखते हैं। इसमें बुराई ही क्या है। मालूम नहीं कि कब इन राज्यों में विकास की बयार बहेगी और यहां के नागरिकों को छोटे-मोटे काम धंधों के लिए हजारों मील दूर नहीं जाना पड़ेगा। ये कोई हाल-फिलहाल से अपने घरों को छोड़कर बाहर नहीं जा रहे हैं। कौन थे गिरमिटिया मजदूर जिन्हें गोरे गन्ने के खेतों में काम करने के लिए मॉरीशस, फीजी, सूरीनाम त्रिनिडाड वगैरह लेकर गए थे? गिरमिटिया श्रमिकों का संबंध कमोबेश उत्तर प्रदेश और बिहार से ही था। ये 1830 से लेकर 1920 तक देश से हजारों मील दूर खेतों पर काम के लिए गए। इन्होंने घनघोर कष्ट सहे। इन्हें सूरीनाम लेकर जाते वक्त झूठ कहा गया कि इन्हें वहां श्री राम (सूरीनाम) की धरती पर सोना मिलेगा लेकिन वहां तो इन्हें बंधुआ मजदूर बना दिया गया । ये बात दीगर है कि उन्हीं गिरमिटिया मजदूरों की अगली नस्लें उन देशों की राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बनने लगीं। अब इस एक सप्ताह के दंगे से गुजरात का हजारों करोड़ का नुकसान हुआ है। जी.आई. डी. सी. के अध्यक्ष राजेंद्र शाह के अनुसार गुजरात में 70 प्रतिशत से ज्यादा श्रमिक उत्तर भारतीय हैं जिनमें ज्यादातर बिहार-यू.पी. से ही हैं । इनमें से 40त्न काम पर नहीं आ रहे । इसका सीधा अर्थ हुआ उत्पादकता में 40प्रतिशत की कमी। यह हजारों करोड़ का घाटा है। इसकी क्षतिपूर्ति करने में तो बरसों लग जायेंगे क्योंकि गाड़ी जब पटरी से उतर जाती है तो काम को पुरानी चाल पर वापस लौटने में वक्त, कष्टप्रद श्रम और धन तो लगता ही है । अब यह दंगा भड़काया किसने, यह भी जान लेना जरूरी है । इस शख्स का नाम है अल्पेश ठाकोर जो अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी का राष्ट्रीय सचिव और राहुल गाँधी का चहेता है । राहुल ने अल्पेश को बिहार में कांग्रेस का प्रभारी बनाया है । यही अल्पेश अपने को गुजरात का राज ठाकरे बनाना चाहता है । राहुल गाँधी सबकुछ जानते हुए अल्पेश को पार्टी से निकाल क्यूँ नहीं रहे हैं? क्या राहुल ने अल्पेश को मूक स्वीकृति दे रखी है? क्या इससे उत्तर भारत में उनको कांग्रेस का लाभ होता दिख रहा है? क्या अब अल्पेश बिहार के प्रभारी होकर बिहार में प्रवास कर पायेंगे? राहुल को जवाब देना पड़ेगा । संक्षेप में इतना ही कहना चाहूँगा कि किसी अपराधी की पहचान उसकी जाति, धर्म, प्रदेश आदि के हिसाब से नहीं होनी चाहिए।

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