गुजरात की ‘चुनावी नफरत’

Opinion

गुजरात की मात्र 14 माह की बच्ची से बलात्कार! यह शर्मनाक, जघन्य और पाशविक करतूत किसी एक व्यक्ति ने ही की होगी, लेकिन हमले और गुजरात से खदेडऩे के शिकार उप्र और बिहार के मूल निवासी क्यों हुए? इस हैवानियत को किसी राज्य की सामुदायिक मानसिकता कैसे माना जा सकता है? नफरत का सैलाब उत्तर भारतीयों के खिलाफ क्यों फूटा? संविधान को भी ताक पर क्यों रख दिया गया? गुजरात तो राष्ट्रपिता गांधी का गृहराज्य है। गुजरात शांति, सद्ïभाव और सुकून का एक अंतरराष्ट्रीय उदाहरण रहा है। फिर नफरत के बीज किसने बोए? किसने उप्र-बिहार के लोगों को सुबह 9 बजे तक गांव छोड़कर चले जाने या घर जला देने की धमकी दी थी? गुजरात में करीब 2.70 करोड़ लोग दूसरे राज्यों से आते हैं। संविधान कश्मीर से कन्याकुमारी तक किसी भी राज्य, शहर और गांव में बसने, काम-धंधा करने का मौलिक अधिकार देता है। फिर खौफजदा, भयभीत और दहशत में सहमी भीड़ रेलगाडिय़ों, बसों और अन्य वाहनों में क्यों दिखाई दी? गुजरात से 50,000 से ज्यादा उत्तर भारतीयों ने पलायन क्यों किया? क्या वे उप्र-बिहार से वापस आएंगे? गौरतलब है कि गुजरात की विकास-यात्रा में बिहार-उप्र से जाने वाले मजदूरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनकी मेहनत ने गुजरात को ‘मॉडल राज्य बनाया है। बदले में गुजरात ने उनकी ‘रोटी का इंतजाम किया है। रोटी और रोजगार का गूढ़ संबंध इन तीनों राज्यों के बीच रहा है और यही उनकी सामूहिक ताकत भी है। यदि स्थितियां ऐसी ही बनी रहीं, तो कौन चलाएगा गुजरात के हजारों कारखाने..? कौन करेगा मजदूरी और मेहनतकशी के काम..? सवाल यह है कि नफरत की हवाएं सिर्फ बलात्कार की राक्षसी हरकत से ही पैदा हुईं या यह नफरत चुनावी है? रोजगार के मुद्ïदे पर तनाव फैलाया जा रहा है? क्या नफरत और पलायन से भी चुनाव जीते जा सकते हैं? गुजरात में बीते 8-10 दिनों में जो भी हुआ है, वह असंवैधानिक ही नहीं, विभाजनकारी भी है। खबरों के दौरान कांग्रेस विधायक अल्पेश ठाकोर का भड़काऊ भाषण सुना और नफरत के आरोप भी ‘ठाकोर सेना पर हैं। हम वस्तुस्थिति नहीं जानते, लेकिन अल्पेश सवालिया हैं, तो गुजरात पुलिस और सरकार ने उन्हें जेल में क्यों नहीं ठूंसा? कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कार्रवाई वाला बयान क्यों नहीं दिया? और कांग्रेस के गुजराती नेता और प्रवक्ता देश के टीवी चैनलों और मीडिया से मुंह क्यों छिपाते रहे? गैर-हाजिर क्यों रहे? एक पत्ता भी खड़कता है, तो कांग्रेस सवालों के साथ प्रधानमंत्री मोदी पर पिल पड़ती है। भाजपा-एनडीए के संबद्ध मुख्यमंत्रियों ने आपस में बात कर सार्वजनिक बयान दिए हैं और अफवाहों को ध्वस्त करने की कोशिश भी की है। यह अराजकता भीड़तंत्र द्वारा कानून अपने हाथ में लेने की बढ़ती प्रवृत्ति का उदाहरण भी हो सकती है। यदि बिहारी और उप्र वाले त्योहारों के मौसम में घर लौटते, तो वह गतिविधि सामूहिक न होती और उनके चेहरों पर दहशत के भाव न होते, लिहाजा इसे त्योहारी गमन न कहकर ‘पलायन ही माना जाए। दरअसल सोशल मीडिया ने भी बलात्कार के केस में ‘आग में घी डाला। नतीजतन गैर-गुजराती, खासकर उप्र-बिहार वाले निशाने पर आ गए। बहरहाल नफरत के जो अंधड़ चले, उन्होंने बर्बादी के चिन्ह तो छोड़े हैं, लेकिन हमारे देश की ‘अनेकता में एकता वाले सिद्धांत को भी पलीता लगाया है। विविधता में एकता हमारी संस्कृति है, हमारी पहचान है, हमारी खूबी है, भाईचारे को रेखांकित करती रही है, लेकिन अब उस पर सवाल टांक दिए गए हैं। महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों को मार-मार कर खदेड़ा गया। वह एक राजनीतिक दल की मुहिम थी। वह फिलहाल शांत है, तो गुजरात में उसे दोहराया जा रहा है। क्या विकास, प्रगति, निर्माण के तमाम मुद्ïदों को भूलकर राज्य बनाम राज्य का खेल ही खेला जाएगा? यदि ऐसा ही जारी रहता है, तो सभी राज्यों के बाशिंदे अपने-अपने राज्य तक सिमट कर रह जाएंगे। आज जो करीब 15 लाख उत्तर भारतीय गुजरात के अकेले सूरत शहर में ही काम करते हैं और गुजराती व्यापारियों के धंधे में महत्त्वपूर्ण योगदान देते रहे हैं, राज्य-राज्य के अलगाव में कैसे काम करेंगे? ज्यादा नुकसान व्यापारियों को ही होगा। क्योंकि अरबों रुपए का निवेश हो चुका है। राज्य और देश के राजस्व पर भी असर पड़ेगा। मजदूर की जरूरतें सीमित हैं, लिहाजा वह तो कहीं भी काम कर लेगा। हर राज्य में नफरत के हिचकोले नहीं हैं। विदेशों में उनके लिए खूब मौके हैं। सार रूप में भारत देश प्रभावित होगा। जरूरी है कि ऐसे नफरतबाजों को कड़ी सजा दी जाए और प्रमाणित होने पर उन्हें चुनाव के अयोग्य घोषित किया जाए। फिलहाल गुजरात में हालात शांत बताए जा रहे हैं, लिहाजा उप्र-बिहार वाले अपने-अपने काम पर लौटें।

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