अब यादों में डाक वाली चिट्ठीयां

Opinion

 

सीधा-साधा डाकिया जादू करे महान, एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान। निदा फाजली के इस शेर से डाक विभाग के महत्व को समझा जा सकता है। फाजली ने जब ये शेर लिखा था उस वक्त देश में डाक विभाग ही एकमात्र साधन था, जो लोगों के पास एक स्थान से दूसरे स्थान तक लोगों के संदेश पहुंचाता था। आज नजारा पूरी तरह से बदल चुका है। इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव ने डाक विभाग के महत्व को कम कर दिया है। आज लोगों ने हाथ से चिट्ठीयां लिखना छोड़ दिया है। अब ई-मेल, वाट्सएप के माध्यमों से मिनटो में लोगो में संदेशों का आदान प्रदान होने लगा है। पहले डाक विभाग हमारे जनजीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता था। गांव में जब डाकिया डाक का थैला लेकर आता था तो बच्चे-बूढ़े सभी उसके साथ डाक घर की तरफ इस उत्सुकता से चल पड़ते थे कि उनके भी किसी परिजन की चिट्ठी आ जाये। डाकिया जब नाम लेकर डाक बांटना शुरू करता तो सभी लोग अपनी या अपने पास-पड़ोसी की चिट्ठी ले लेते व उनको बड़े चाव से सम्भलवाते थे। उस वक्त शिक्षा का प्रसार ना होने से अक्सर महिलाएं अनपढ़ होती थीं। इसलिये चिट्ठी लाने वालो से ही चिट्ïिठयां पढ़वाती भी थीं और लिखवाती भी थीं। कई बार चिट्ठी पढऩे, लिखने वाले बच्चों को इनामस्वरूप कुछ पैसा या खाने को गुड़, पताशे भी मिल जाया करते थे। इसी लालच में बच्चे ज्यादा से ज्यादा चिट्ठीयां पहुंचाने का प्रयास करते थे। पहले गांवो में बैंको की संख्या नगण्य थी, इस कारण बाहर कमाने गये लोग अपने घर पैसा भी डाक में मनीआर्डर के द्वारा ही भेजते थे। मनीआर्डर देने डाकिया स्वयं प्राप्तकर्ता के घर जाता था व भुगतान के वक्त एक गवाह के भी हस्ताक्षर करवाता था। इसी तरह रजिस्टर्ड पत्र देते वक्त भी प्राप्तकर्ता के हस्ताक्षर करवाये जाते थे। डाक विभाग अतिआवश्यक संदेश को तार के माध्यम से भेजता था। तार की दर अधिक होने से उसमें संक्षिप्त व जरूरी बाते ही लिखी जाती थीं। तार भी साधारण, अर्जेन्ट होते थे। अर्जेन्ट तार की दर सामान्य से दोगुनी होती थी। उस वक्त पत्रकारिता में भी जरूरी खबरें तार द्वारा भेजी जाती थी, जिनका भुगतान समाचार प्राप्तकर्ता समाचार पत्रो द्वारा किया जाता था। इस बाबत समाचार पत्र का सम्पादक जिलों में कार्यरत अपने संवाददाताओं को डाक विभाग से जारी एक अधिकार पत्र देता था जिनके माध्यम से संवाददाता अपने समाचार पत्र को बिना भुगतान किये डाकघर से तार भेजने के लिये अधिकृत होता था। वर्ष 2013 की 15 जुलाई को सरकार ने तार सेवा को बन्द कर दिया। फोन से पहले दशकों तक दूर तक संदेश भेजने के दो ही जरिए थे-चिट्ठी और तार। आज डाक में लोगों की चिट्ठीयां तो गिनती की ही आती हैं, मनीआर्डर भी बन्द से ही हो गये हैं। मगर डाक से अन्य सरकारी विभागों से सम्बन्धित कागजात, बैंको व अन्य संस्थानो के प्रपत्र काफी संख्या में आने से डाक विभाग का महत्व फिर से एक बार बढ़ गया है। डाक विभाग कई दशकों तक देश के अंदर ही नहीं, बल्कि एक देश से दूसरे देश तक सूचना पहुंचाने का सर्वाधिक विश्वसनीय, सुगम और सस्ता साधन रहा है। इस क्षेत्र में निजी कम्पनियों के बढ़ते दबदबे और फिर सूचना तकनीक के नये माध्यमों के प्रसार के कारण डाक विभाग की भूमिका लगातार कम होती गयी है। वैसे इसकी प्रासंगिकता पूरी दुनिया में आज भी बरकरार है। वर्तमान में डाक विभाग का एकाधिकार लगभग खत्म हो गया है। यही कारण है कि डाक विभाग दुनिया भर में अब कई नयी तकनीकी सेवाओं से जुड़ रहा है। 9 अकटूबर को पूरी दुनिया में विश्व डाक दिवस के तौर पर मनाया जाता है। वर्ष 1874 में इसी दिन यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का गठन करने के लिए स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में 22 देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था। वर्ष 1969 में टोकियो, जापान में आयोजित सम्मेलन में विश्व डाक दिवस के रूप में इसी दिन को चयन किये जाने की घोषणा की गयी। एक जुलाई 1876 को भारत यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बनने वाला पहला एशियाई देश था। जनसंख्या और अंतरराष्ट्रीय मेल ट्रैफिक के आधार पर भारत शुरू से ही प्रथम श्रेणी का सदस्य रहा। विश्व डाक दिवस का मकसद आम आदमी और कारोबारियों के रोजमर्रा के जीवन समेत देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में डाक क्षेत्र के योगदान के बारे में जागरूकता पैदा करना है। दुनियाभर में प्रत्येक वर्ष 150 से ज्यादा देशों में विविध तरीकों से विश्व डाक दिवस आयोजित किया जाता है।

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