संसदीय चुनाव का पूर्वाभ्यास

Opinion

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पांच राज्यों में चुनावों की घोषणा को अगले साल होनेवाले संसदीय चुनावों का पूर्वाभ्यास माना जा रहा है। कुछ हद तक यह सही भी है। मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ तो भाजपा शासित राज्य है और मिजोरम या सिक्किम की तरह छोटे-मोटे राज्य नहीं हैं। जो अन्य दोनों राज्य हैं, तेलंगाना और मिजोरम, इनमें भाजपा जीते या न जीते, कोई खास फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि वहां दूसरी पार्टियों का शासन है। इन पांचों राज्यों में यदि कांग्रेस की सीटें बढ़ गईं या जीत हो गई तो उसे राजनीतिक भूकंप की तरह समझा जाएगा। मप्र और छत्तीसगढ़ में भाजपा लगातार 15 वर्षों से सत्तारुढ़ है और इन दोनों राज्यों में कांग्रेस के पास कोई सशक्त प्रांतीय नेतृत्व नहीं है। इसके अलावा बसपा और सपा यदि कांग्रेस से अलग होकर लड़ेंगी और किन्हीं स्थानीय पार्टियों से गठबंधन करके लड़ेंगी तो निश्चय ही वे विपक्ष के वोट काटेंगी और भाजपा के लिए वरदान साबित होंगी। जहां तक राजस्थान का सवाल है, वहां कांग्रेस की स्थिति अन्य प्रदेशों से बेहतर है लेकिन वहां भी कांग्रेस में आपसी खींचतान का बोलबाला है। यह ठीक है कि राजस्थान की जनता हर बार नई पार्टी की सरकार लाने की आदी हो चुकी है लेकिन इस बार भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने वहां एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है। राजस्थानी जनता को पटाने के लिए किन-किन उपकारों की बौछार नहीं की जा रही है ? इन तीनों हिंदी राज्यों ने इस मामले में जयललिता के तमिलनाडु को पीछे छोड़ दिया है। इन तथ्यों के आधार पर माना जा सकता है कि इन तीनों राज्यों में भाजपा को हराना आसान नहीं है लेकिन ध्यान देने लायक एक बात यह है कि क्या इन राज्यों की जनता अपनी प्रादेशिक सरकारों के काम-काज के आधार पर ही वोट करेंगी ? होता तो यही है लेकिन पिछले चार सालों में भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व प्रांतीय नेतृत्वों पर इस कदर हावी हो गया है कि साधारण मतदाता का ध्यान वोट डालते वक्त शायद केंद्रीय नेता पर ही रहे। यह संभव है कि उसके दिमाग पर केंद्र सरकार की कथनी और करनी हावी हो जाए। यदि ऐसा हुआ तो इन तीनों राज्यों में भाजपा की शक्ति काफी घट सकती है। शक्ति का यह घटाव ही 2019 के चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी बनेगा।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *