आस्था का केंद्र बना मऊरानीपुर का मेला

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127 वर्ष से अधिक पुराना है जलबिहार का इतिहास
पूजे जाते हैं लठाटोर, दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु
गोमती आवाज ब्यूरो
लखनऊ। राजा भोज की नगरी मऊरानीपुर का इतिहास विश्व में विख्यात है। नगर का नाम आते ही लठाटोर महाराज के रुप में पूजे जाने वाले भगवान नटवर नागर का नाम स्वयं भी मन को गुदगुदा जाता है। नगर का इतिहास सदियों पुराना बताया जाता है। अपनी अनोखी पहचान के लिए जाना जाने वाले नगर को मिनी अयोध्या के नाम से भी जाना जाता है। इन सभी विशेषताओं के साथ साक्ष्यों की मानें तो पूर्ववर्ती सरकार में प्रान्तीय मेला का दर्जा प्राप्त कर चुके मेला यहां के जल बिहार मेला का इतिहास 127 वर्ष से अधिक पुराना बताया जाता है। नगरवासियों की मानें तो अयोध्या के बाद यहां जितने मंदिर स्थापित हैं। उत्तर प्रदेश में इतने मंदिर शायद ही किसी नगर में होंगे। इसके अलावा मऊरानीपुर को ब्रिटिश शासन काल से नगर पालिका का दर्जा प्राप्त है। मऊरानीपुर नगर पालिका का गठन ब्रिटिश शासन में किया गया था। जिसका प्रमाण नगर पालिका के पास है। मऊरानीपुर नगर पालिका में तैनात आशीष कौशिक का कहना है कि मऊरानीपुर में लगने वाले मेला जलबिहार के दस्तावेज भी मौजूद हैं। जिसमें ब्रिटिश शासन द्वारा सन 1891 में मेला जलविहार के बारे में इसका वर्णन किया गया था और पूरा लेखा-जोखा तैयार किया गया था। उस समय रानीपुर और मऊरानीपुर एक हुआ करते थे। सन् 1937 में रानीपुर और मऊरानीपुर अलग किये गए थे। ब्रिटिश काल में भी बिहार के लिए निकलने वाले विमानों का तिलक अंग्रेज गजाशाही(चांदी के सिक्कों) से किया करते थे। उन विमानों में नटवर नंदकिशोर भगवान लठाटोर और गूदर बादशाह सरकार के विमानों समेत अन्य विमानों का प्रमुखता से उल्लेख मिलता है।
ब्रिटिश सरकार भी टेकती थी घुटने, तभी से तिलक की प्रथा हुई शुरु
ब्रिटिश शासन में अंग्रेज भी लठाटोर महाराज और गूदर बादशाह के आगे नतमस्तक होते थे। सन् 1891 में ब्रिटिश शासनकाल में भी भगवान गूदर बादशाह व लठाटोर के साथ अन्य प्राण प्रतिष्ठित विमानों को बिहार के लिए नदी में ले जाया जाता था। उस दौरान अंग्रेज भी भगवान का तिलक चांदी के सिक्कों से किया करते थे। और उनके आगे अपना सर झुकाते थे। यही नहीं उनके साथ सारे विमानों का भी तिलक किया जाता था। तब से यह प्रथा आज तक अनवरत रुप से जारी है। आज भी अंग्रेजी शासन की तर्ज पर नगर पालिका द्वारा सारे विमानों का तिलक किया जाता है। और उनकी आरती उतारकर कर पूजन अर्चन किया जाता है।
इसलिए पड़ा लठाटोर नाम
कहा जाता है कि पूर्व में भगवान माखनचोर कृष्ण को बिहार को ले जाने के लिए लठ्ठों पर बिठाकर ले जाया जाता था। इस दौरान कई बार उनकी अलौकिक शक्ति से नए लठ्ठे भी टूट जाते थे। कमाल की बात तो यह है कि लठ्ठे टूटकर केवल झुक जाते थे कभी उनकी प्रतिमा गिरी नहीं। लोग हड़बड़कार उनका विमान उतार देते थे। इन्हीं लठ्ठों को बार-बार तोडऩे के चलते उनका नाम लाठातोड़ पड़ गया जो अब लठाटोर के नाम से जाने जाते हैं।
मेले में भगवान राम व कृष्ण का मिलता है अद्भुत जोड़
चंद वर्षों पूर्व प्रांतीय मेला बन चुका मेला जलबिहार भगवान राम और भगवान कृष्ण का अद्ïभुत जोड़ का प्रतीक है। जिस पूरे मेले को लठाटोर महाराज की लीलाओं के कारण जाना जाता है। उस मेले में बिहार के लिए ले जाने वाले विमानों की अगुआई भगवान रामराजा सरकार जिन्हें गूदर बादशाह कहा जाता है, करते थे।
क्या है मऊरानीपुर का इतिहास
जब 1914 में फ्लेग नाम की बीमारी फैली हुई थी तब भगवान के विमानों को निकालने पर रोक लगा दी गयी थी। जिस पर भगवान गूदर बादशाह की अगुवाई में सारे विमानों को निकाला गया था। जिसके बारे में स्थानीय लोगों का कहना है कि जब गूदर बादशाह सरकार का विमान सारे विमानों की अगुवाई कर रहा था। तभी अंग्रेजों द्वारा भगवान का विमान थाने में रखवा लिया गया और भगवान रामराजा सरकार के विरुद्ध मुकदमा भी लिखा गया था। जिस पर नगर के संभ्रांत नागरिकों ने ओरछा स्थित कमिश्नरी में भगवान की जमानत ली थी। तब जाकर भगवान को जमानत पर छोड़ा गया था। लेकिन विमानों का विहार अंग्रेज नहीं रोक पाए। तभी से आज भी निरंतर प्रथा जारी बनी हुई है।

 

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