द्वापर से जुड़ी है झिझरिया महोत्सव की यह अनोखी प्रथा

SOCIAL MEDIA

हमीरपुर का पवई गांव जहां पानी में होती है श्रीकृष्ण लीला
27 अक्टूबर से होगा आगाज, शुरू कर दी गयी है तैयारियां
गोमती आवाज ब्यूरो
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में एक ऐसा गांव जहां हजारों सालों से पानी में श्रीकृष्ण लीला का मंचन होता है। पानी में ही श्रीकृष्ण की सोलह कलाओं की लीला देखने के लिए भारी भीड़ जुटती है। दिन में कंस, वकासुर, अघासुर और पूतना सहित अन्य दैत्यों के वध की लीला का मंचन होता है। साथ ही ऐतिहासिक तालाब के किनारे रामलीला का भी आयोजन होता है। इस अनोखी लीला का आगाज 27 अक्टूबर से होगा। इसके लिये तैयारियां शुरू कर दी गयी है। जिले के गोहाण्ड विकास खण्ड क्षेत्र के पवई गांव में हजारों सालों से एक ऐसी परम्परा आज भी कायम है जहां शरद पूर्णिमा की रात गांव में ही साढ़े हेक्टेयर क्षेत्रफल में बने तालाब में श्रीकृष्ण लीला का मंचन हर साल होता है। यह कार्यक्रम झिंझिया महोत्सव के नाम से भी विख्यात है। खास बात यह है कि दिन में पूरे गांव में राम, सीता, राधा श्रीकृष्ण व कंस सहित अन्य दैत्यों की झांकियों की अद्ïभुत शोभायात्रा धूम-धड़ाके के साथ निकाली जाती है। शोभायात्रा के बाद तालाब किनारे कंस, वकासुर, अघासुर, पूतना सहित अन्य दैत्यों के वध की लीला होती है। इसके बाद रामलीला का मंचन भी किया जाता है। लंका दहन का आयोजन तालाब किनारे किया जाता है। रात में गांव के बाहर ऐतिहासिक तालाब में श्रीकृष्ण की लीला शुरू होती है जो रात भर चलती है। बताते हैं कि लीला देखने के लिए बुन्देलखण्ड के अलावा मध्यप्रदेश से जुड़े जनपदों से बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ जुटती है। पानी में श्रीकृष्ण की लीला भी अपने आप में अद्ïभुत है। गांव की सरपंच आशा देवी व उनके पति रामगोपाल ने बुधवार को बताया कि देश के किसी भी हिस्से में इस तरह की सजीव लीला का मंचन नहीं होता है। पानी में ही झिंझिया और सुआटा दैत्य की भी लीलायें होती हैं। यह अनोखी लीला सिर्फ इसी गांव में होती है जिसमें गांव के ही लोग अभिनय करते हैं। उन्होंने बताया कि इस पूरे कार्यक्रम को सम्पन्न कराने में दो लाख से अधिक की धनराशि खर्च होती है। पूरा गांव एकत्र होकर आयोजन कराने के लिये चंदा देता है।
श्रीकृष्ण की सोलह कलाओं से जुड़ी है लीला
गांव की सरपंच आशा देवी के पति रामगोपाल ने बताया कि द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा की रात सोलह कलाओं की लीला की थी। तभी से उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र में इस तरह के आयोजन की परम्परा पड़ गयी है जो आज भी कायम है। उन्होंने बताया कि शरद पूर्णिमा के दिन से ही अनोखी प्रथा के कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं मगर शाम होते ही पूरे गांव के लोग, तालाब किनारे एकत्र होकर रात भर तक पानी में होने वाली लीला का सजीव मंचन देखते हैं। इसके लिए खास इंतजाम भी किये जाते हैं।
पानी में श्रीकृष्ण कालिया नाग का करते वध
पवई गांव में बड़ा नाम के तालाब में नावों में रथ पर सवार श्रीकृष्ण कालिया नाग का वध करते हैं। गांव के ही एक व्यक्ति को कालिया नाग बनाया जाता है जो बड़े गुब्बारे में घुसकर पानी में तैरता है। उसे तालाब में दौड़ाया जाता है। यह लाइव लीला देखकर गांव के बच्चे और महिलायें सहम जाती हैं। लीला देखने के लिए बुन्देलखण्ड क्षेत्र के और मध्यप्रदेश से जुड़े इलाकों से बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ उमड़ती है।
महिलायें करती हैं अभिनय
गांव की सरपंच आशा देवी ने बताया कि इस महोत्सव के लिए बाहर से किसी भी कलाकार को नहीं बुलाया जाता है। गांव के डा.मंगल सिंह कंस का अभिनय करते हैं। ईश्वर दास पूतना का रोल करते हैं। गांव की कई महिलायें भी पानी में श्रीकृष्ण लीला के मंचन में अभिनय करती हैं। जिन्हें जो रोल दिया गया है वह अभी से तैयारी करने लगे हैं। गांव के सुखदेव श्रीराम का रोल करेंगे। सीताराम को रावण का रोल दिया गया है। कार्यक्रम के दौरान गांव के ही युवकों की फौज सुरक्षा व्यवस्था में मुस्तैद रहेंगे।
शरद पूर्णिमा में लोगों में खत्म होते हैं मतभेद
ग्राम प्रधान प्रतिनिधि रामगोपाल ने दावा करते हुए बताया कि शरद पूर्णिमा के दिन ही तालाब किनारे एकत्र होकर आपस में सभी लोग मतभेद खत्म करते हैं। पूरा गांव एकजुट होकर अपने क्षेत्र के विकास कराने और एक दूसरे के सुख-दुख में मदद करने का भी संकल्प लेता है। इसीलिए इस गांव में यह अद्ïभुत परम्परा पांच पीढ़ी से लगातार चल रही है। उनका कहना है कि गांव का हर व्यक्ति इस अनोखी लीला को सम्पन्न कराने के लिए आगे आता है। वह कोई न कोई जिम्मेदारी भी लेकर उसे पूरा करता है।
गुब्बारे का हेलीकाप्टर उड़ाने की भी प्रथा
ग्राम प्रधान प्रतिनिधि रामगोपाल ने बताया कि अनोखी लीला का आगाज होने से पूर्व तालाब किनारे एक बड़े गुब्बारे का हेलीकाप्टर बनाया जाता है जिसमें पांच हजार के इनामी की पर्ची रखकर गैस भरकर इसे उड़ाया जाता है। यह गुब्बारा 10 से 15 किमी दूर हवा में उड़ता हुआ किसी भी गांव में जब गिरता है तब इसे लाने वाले को गांव स्तर पर बनी कमेटी की ओर से पांच हजार रुपये का इनाम दिया जाता है। उन्होंने बताया कि यह परम्परा भी बहुत पुरानी है। कुछ दशक पूर्व इनाम की धनराशि भी बढ़ाई गई है।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *